नवरात्रि में कुमारी पूजन
नवरात्रि पूजन पर विशेष

द्वारा: आचार्य डॉ0 धीरेन्द्र मनीषी।
रुद्रयामल के उत्तरखंड के छठे पटल में यह आया है कि नवरात्रि में कुमारी का पूजन प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक वृद्धि क्रम में किया जाना चाहिए और 1 वर्ष से लेकर 16 वर्ष तक की कन्याओं का अलग-अलग संज्ञा है। 1 वर्ष की उम्र वाली बालिका को संध्या कहते हैं। दो वर्ष वाली सरस्वती के नाम से जानी जाती हैं। 3 वर्ष वाली कुमारी को त्रिद्धामूर्ति कहते हैं। 4 वर्ष वाली कन्या कालिका कहलाती है। 5 वर्ष पूर्ण होने पर कुमारी को सुभगा की संज्ञा दी गई है। 6 वर्ष की कुमारी उमा, 7 वर्ष की कुमारी मालिनी, 8 वर्ष की कुमारी को कुब्जा, 9 वर्ष की कुमारी को कालसंदर्भा, 10 वर्ष पूर्ण होने पर उसे कन्या का नाम अपराजिता और 11वीं वर्ष के पूर्ण होने पर उस कन्या को रुद्राणी की संज्ञा दी गई है। 12वीं वर्ष की कन्या भैरवी, 13वें वर्ष की कन्या महालक्ष्मी, 14 वर्ष पूर्ण होने पर उसे कन्या को पीठनायिका, 15 वर्ष पूर्ण होने पर क्षेत्रज्ञा और 16वें वर्ष में कन्या को अंबिका के नाम से जाना जाता है। रुद्रयामल के उत्तराखंड में कुमारी के अलग-अलग नाम और प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक वृद्धि भेद से कुमारी पूजन करने की बात कही गई है। इस प्रकार हम यह भी पाते हैं की 5 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की अवस्था तक की बालिका अपने स्वरूप को प्रकाशित करने वाली कुमारी कहलाती है। जहां तक कुमारी की बात है, 5 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की अवस्था कुमारी की संज्ञा को अभिभूत करता है। विशेष यह है कि 6 वर्ष की अवस्था से आरंभ करके 9 वर्ष की अवस्था की जो कुमारी कन्याएं होती हैं, उनके पूजन से जीवन में अभीष्ट की प्राप्ति होती है और मन के सोचे हुए कार्य पूर्ण होते हैं।
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