नवरात्र साधना का संदेश

Apr 2, 2025 - 22:32
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नवरात्र साधना का संदेश
सिद्ध पीठ विंध्याचल निवासिनी मां

विंध्यधाम, मिर्जापुर।

आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए नौ दिवसीय आस्था के पर्व के शब्द 'नवरात्र' से स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि रात्रि को नया स्वरूप दिया जाए। ऋषियों के इस भाव की गहराई में जाने से अनेक अर्थ निकलते दिखाई पड़ रहे हैं। प्रथमतः जीवन में खुशहाली का प्रकाश ही नहीं मिलता। संभव है कि जीवन मे कठिनाइयों के अंधकार से भी सामना करने की नौबत आ जाए। इसलिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों का अंधकार सामने हो तो भी प्रबल साधना के जरिए उसका मुकाबला किया जाए। नवरात्र पर्व का प्रयोग नवरात्र एवं नौरात्र दोनों रूपों में किया जाता है। इसमें 'नव' शब्द 'नया' के साथ संख्या सूचक भी है जबकि 'नौ' शब्द सिर्फ संख्या सूचक ही है। इसलिए 'नवरात्र' एवं 'नौरात्र' दोनों के अलग-अलग स्वरूपों पर भी विचार की जरूरत है। वासन्तिक नवरात्र हो या शारदीय नवरात्र हो, यह दोनों ऋतुराज-परिवार की श्रेणी की ऋतुएं हैं। इसमें वासन्तिक नवरात्र राजा है तो शारदीय नवरात्र राजकुमार है। वासन्तिक नवरात्र के राजा होने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संदेश यह है कि इसमें रात छोटी होने लगती है जबकि दिन बड़ा होने लगता है। यानी अंधकार कम प्रकाश अधिक होता है। वसंत ऋतु त्याग और सृजन की ऋतु इन अर्थों में है कि वर्ष भर पालित-पोषित पत्तों से वसंत मोह छोड़ देता है। उनकी जगह नए पल्लव इसी ऋतु में निकलते हैं। इस तरह नवसृजन का सन्देश वसन्त देता है। इसके साथ वासन्तिक नवरात्र में ठंडक कम होकर वातावरण ऊर्जायुक्त होने लगता है। यह आलस्य की शिथिलता से मुक्त होकर कर्मठता की ओर बढ़ने का संदेश है। जबकि शारदीय नवरात्र में रात बड़ी होती है। इसका तो साफ मतलब है कि अंधेरे की अवधि लंबी हो जीवन में तब भी प्रकृति के इस संदेश को जीवन में आत्मसात किए रहना चाहिए।

   रात के अंधेरे में साहस की ऊर्जा प्रज्वलित रखने का संदेश धर्मग्रन्थों में ढेरों हैं। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के समक्ष कठिनाइयों का अंधेरा खड़ा हुआ। राज्य की जगह जंगल मिल गया । उस जंगल में वानर-रीछ को संगठित करना साहस का काम था। श्रीराम के दूत हनुमान जी अंधकार की लंका में गए तो वहां उजाले के रूप में विभीषण को तलाश लिया। इसी तरह श्रीकृष्ण जेल के अंधकार में जन्म लेकर संघर्ष का प्रकाश फैलाने में सफल रहे। इसी तरह रात्रिकाल दिन की अपेक्षा शांतिकाल है। इस अवधि में ही नींद के रूप में विश्राम मिलता है जो अगले दिन में सक्रिय रखने का सामर्थ्य प्रदान करता है। श्रीदुर्गासप्तशती में 'या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता' की प्रार्थना की गई है। इसलिए नवरात्र या नौरात्र की अवधि का उपायोग साधना के लिए करना चाहिए।

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सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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