श्रीराम के प्राकट्य का आशय मन में प्रकाश का प्राकट्य होना है

Apr 6, 2025 - 03:33
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श्रीराम के प्राकट्य का आशय मन में प्रकाश का प्राकट्य होना है

रामकथाओं में तो यह उल्लिखित है कि मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे, सीता के पति और भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के ज्येष्ठ भाई थे। इसी आधार पर श्रीराम को पुरुष रूपी अवतार मानकर चैत्र शुक्ल नवमी को उनकी जयंती मनाई जाती है तथा श्रीराम की कृपा पाने के लिए व्रत उपवास रखा जाता है और विविध धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।

   चूंकि धर्मग्रन्थों में इसी तरह का उल्लेख है लिहाजा जन-जन के मन में श्रीराम की यही छवि बनी हुई है, लेकिन प्रतीकों में श्रीराम के रूप-स्वरूप का निर्धारण किया जाए तो वह और भी ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है। चैत्र शुक्ल की नवमी की तिथि को श्रीराम के जन्म का नहीं बल्कि प्रकट होने का उल्लेख रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास 'भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी' चौपाई में करते हैं। सिर्फ इसी चौपाई पर गौर किया जाए तो इसमें 'जन्म' शब्द का उल्लेख नहीं है जबकि मनुष्य जन्म लेता है, प्रकट नहीं होता। मनुष्य के जन्म की भी प्रक्रिया है। 'माँ' के गर्भ में नौ माह तक रहने के बाद ही शिशु का जन्म होता है। इस दृष्टि से 'जन्म' की जगह 'प्रकट' शब्द के उल्लेख से तो यही प्रतीत होता है कि 'नौरात्रि' की साधना एवं तपस्या के बाद अंतरतम में राम रूपी प्रकाश का प्रकटीकरण मानना ज्यादा सार्थक है। श्रीराम 'कौशल्या' के गर्भ से प्रकट होते हैं। यहां 'कौशल्या' शब्द पर भी मनन करना चाहिए। कौशल्या का सीधा अर्थ 'कुशलता' से है। जब मन के गर्भ में काम-क्रोध, मोह-लोभ तथा सांसारिक कामनाओं का परित्याग कर 'आत्मिक ऊर्जा' के लिए नौरात्रि की अवधि में साधना की जाएगी तो उस साधना का उद्देश्य कुशलता का ही होगा । यह कुशलता मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की तरह आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश तथा लोक हितकारी होगी। 'कुशलता' शब्द में 'कुश' शब्द तीक्ष्णता का सूचक है। 'कुशा' की तीक्ष्णता का प्रयोग 'कुशाग्र बुद्धि' के लिए किया जाता। कुशाग्र बुद्धि वाला व्यक्ति जब सांसारिक जंगल में जाता है तो वह जंगल में भी मंगल का वातावरण बना देता है।

     चैत्रमास वसंत ऋतु है। गोस्वामी तुलसीदास की 'नौमी तिथि मधु मास पुनीता, सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता' चौपाई में 'मधुमास', 'शुक्ल पक्ष' एवं 'अभिजित' तथा 'हरिप्रीता' का उल्लेख अत्यंत सार्थक इसलिए है क्योंकि 'मधुमास' शब्द मृदुल वातावरण एवं शुक्ल पक्ष उजाले से संबन्ध रखता है। इसी तरह अभिजित मुहूर्त शुभ समय से है जो भगवान को अतिप्रिय है। किसी शुभ कार्य की शुरुआत अभिजीत मुहूर्त में किए जाने की सलाह दी जाती है। इसी क्रम में गोस्वामी जी ने 'मध्य दिवस अति सीत न घामा' अर्द्धाली में भी गहरा संकेत देते हैं। इस अर्द्धाली के अनुसार 'मधुमास में न ज्यादा शीत है और न ज्यादा घाम (धूप) है' का आशय ही है कि जिस किसी का जब व्यक्तित्व मधुमास जैसा हो जाता है तो अत्यंत शीतलता का मतलब उसमें आलस्य नहीं रहता और न घामा (धूप) यानी मष्तिष्क में उग्रता नहीं रहती है। 

    इन प्रतीकों का सीधा आशय राम जैसे प्रकाश के प्राकट्य का है। यही राम शरद ऋतु के नवरात्र में नौ दिन की शक्तिपूजा के बाद मां दुर्गा से रावण-वध की शक्ति प्राप्त करते हैं। इसलिए लोकपूज्य राम की आराधना का मतलब आत्मिक ऊर्जा का प्रकटीकरण है। 

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सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर

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