होलिका दहन 2 मार्च को और होली 4 मार्च को क्यों मनाया जा रहा

होलिका दहन 2 मार्च को और होली 4 मार्च को क्यों मनाया जा रहा

Feb 28, 2026 - 14:14
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होलिका दहन 2 मार्च को और होली 4 मार्च को क्यों मनाया जा रहा

हिन्द भास्कर:- होली बसन्त ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय पर्व है। श्री सनातन ज्योतिष पद्यति के अनुसार होली का पर्व फाल्गुन मास, शुक्ल-पक्ष, पूर्णिमा-तिथि, विक्रम संवत 2082 शाके 1947 सन् 2026 ई0। इस वर्ष फाल्गुन मास- शुक्ल-पक्ष, चतुर्दशी/पूर्णिमा, दिनांक, 2 मार्च 2026 दिन- सोमवार, अश्वलेशा/मघा-नक्षत्र होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात्रि 11ः53 से 12ः50 तक भद्रा के पुच्छ में शुभ मूर्हूत होगा। भद्रा का समय 17ः18 से 04ः56 तक रहेगा।

काशी महावीर पंचांग के अनुसार होली 3.03.2026 को चन्द्र ग्रहण के उपरान्त काशी की परम्परा के अनुसार शंकर जी पर गुलाब चढ़ाया जायेगा। सर्वत्र होलिकोत्सव रंगोत्सव, बसन्तोत्सव होलिका विभूति धारण 04.03.26 को प्रातः 8 बजे बुधवार को होना शुभ होगा। धार्मिक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होली का पर्व प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर था जो अहंकार में वह अपने को ईश्वर मानता था, उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबन्दी लगा रक्खी थी।

इस असुर का एक पुत्र प्रहलाद नारायण भक्त था। वह पुत्र हमेशा नारायण की भक्ति में मग्न रहता था। पुत्र के इस बर्ताव से हिरण्यकश्यप बहुत नाराज रहता था। बच्चे को तरह-तरह की यातना देकर उसकी ईश्वर के प्रति भक्ति को खत्म करना चाहता था। जब प्रहलाद नहीं माना तो अंत में अपनी बहन होलिका से इसको नष्ट करने के लिए कहा। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग से नहीं जलेगी। इसलिए होलिका ने प्रहलाद को भस्म करने के लिए उसे गोद में लेकर आग में बैठ गयी।

भगवान ने भक्त प्रहलाद की रक्षा की और होलिका को आग में जलाकर भस्म कर दिया। हमेशा आसुरीय शक्ति का दमन होता है और अच्छाई की विजय होती है। दूसरा वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार बदलते मौसम का प्रभाव धीरे-धीरे सर्दी खत्म होती है और बढ़ती गर्मी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया और मच्छरों की संख्या बढ़ती है। इस बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए होलिका पर्व का होना काफी महत्वपूर्ण होता है। होलिका दहन के दौरान परिक्रमा करने से शरीर में मौजूद बैक्टीरिया खत्म होने लगते हैं।

वैज्ञानिकों का एक मत यह भी है कि होली रंगों का पर्व है और रंग हमारे जीवन में कई रोगों से रंगथैरेपी में कारगर सिद्ध हुए हैं। रंग थैरेपी में - नारंगी रंग - यह रंग उत्साह को बढ़ाकर फेफड़ों को मजबूत बनाता है, आस्थमा, ब्रोनकाइटिसस्ट और किड़नी इन्फेक्सन के मामलों में अधिक उपयोगी साबित होता है। नीला रंग - यह ठंड रंग का प्रतीक है उच्च रक्तचाप को कम करने में मददगार साबित होता है। सिरदर्द, सूजन, सर्दी, खांसी के उपचार में इसकी थैरेपी का प्रयोग किया जाता है।

पीला रंग - यह रंग मानसिक उत्तेजना के साथ नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाता है। पेट खराब, खाज, खुजली में पीला रंग फाइदेमन्द होता है। लाल रंग - लाल रंग गर्म प्रकृति का होने के कारण दर्द में अधिक फाइदेमन्द हैं। अनिद्रा, कमजोरी और रक्त से जुड़े रोगों में राहत देता है।

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