औपनिवेशिक शासन ने भारत के गौरवशाली अतीत को विकृत किया : डॉ. बालमुकुंद पांडेय

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में इतिहासविदों ने भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि औपनिवेशिक शासन ने भारत के गौरवशाली इतिहास को विकृत कर विदेशी दृष्टिकोण को स्थापित किया। वक्ताओं ने तथ्यपरक, शोध आधारित एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य से इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर विस्तृत विचार व्यक्त किए।

Jul 17, 2026 - 18:52
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औपनिवेशिक शासन ने भारत के गौरवशाली अतीत को विकृत किया : डॉ. बालमुकुंद पांडेय

गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, सतीश चंद्र मित्तल शोध संस्थान, गोरखपुर तथा भारतीय इतिहास संकलन समिति, गोरक्ष प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में "भारतीय इतिहास लेखन में नए बदलाव एवं चुनौतियाँ" विषय पर अकादमिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इतिहास लेखन के बदलते प्रतिमानों, औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि की समीक्षा तथा भारतीय परिप्रेक्ष्य से इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा हुई।

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। विभागाध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार तिवारी ने स्वागत भाषण में कहा कि वर्तमान समय में भारतीय दृष्टि से इतिहास को समझने और लिखने का प्रयास अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कला संकायाध्यक्ष एवं प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो. राजवंत राव ने कहा कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होने के बावजूद भारतीय शिक्षा व्यवस्था औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक ज्ञान-पद्धति ने भारतीय ज्ञान-परंपरा, भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेलने का प्रयास किया।

विशिष्ट अतिथि प्रो. एस.एन. चौबे ने कहा कि इतिहास लेखन का आधार तथ्य होते हैं और प्रामाणिक इतिहास के लिए तथ्य-संकलन अनिवार्य है। उन्होंने चौरी-चौरा के संदर्भ में प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि इस घटना को नए ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास भारतीय इतिहास लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इतिहास विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. निधि चतुर्वेदी ने इतिहास के उन उपेक्षित पक्षों पर प्रकाश डाला जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास संकलन योजना ने इन रिक्तियों को भरने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

मुख्य अतिथि एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि भारतीय इतिहास को केवल विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों, मुगलकालीन अभिलेखों और औपनिवेशिक इतिहासकारों के लेखन तक सीमित कर देखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत के गौरवशाली अतीत को विकृत कर अंग्रेज़ी दृष्टिकोण को इतिहास लेखन पर आरोपित किया, जिससे भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अनेक महत्वपूर्ण धरोहरें इतिहास के पन्नों से ओझल हो गईं। उन्होंने शोधार्थियों से भारतीय चेतना और भारतीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर इतिहास के अध्ययन एवं लेखन का आह्वान किया।

प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों ने इतिहास लेखन से जुड़े विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तार से उत्तर दिया।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. सुनीता ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. आशीष कुमार सिंह, प्रो. श्वेता सहित विभाग के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में शोधार्थी उपस्थित रहे।

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार