भारतीय उच्च शिक्षा का 'सेमेस्टर संकट'
अशोक कुमार
पिछले एक दशक में भारतीय विश्वविद्यालयों के गलियारों में कुछ भारी-भरकम शब्द बहुत गूँजे हैं— 'सेमेस्टर सिस्टम', 'चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम' (CBCS), 'ग्रेडिंग' और 'सतत मूल्यांकन'। कागजों पर तो ऐसा लगता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली वैश्विक मानकों के साथ कदमताल कर रही है, लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। वास्तविकता यह है कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों ने आधुनिक शिक्षा की शब्दावली (Vocabulary) तो अपना ली है, लेकिन वे उसके पीछे के दर्शन (Philosophy) को अपनाने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
1. आधा-अधूरा सेमेस्टर: केवल नाम का बदलाव
सेमेस्टर प्रणाली का मूल दर्शन है—गहनता और निरंतरता। लेकिन हमारे यहाँ इसे 'एनुअल सिस्टम' को बस दो हिस्सों में काटकर लागू कर दिया गया है। जिसे हम 'एंड-सेमेस्टर' परीक्षा कहते हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि पुराने जमाने की 'छमाही' और 'सालाना' परीक्षाओं का ही बदला हुआ रूप है।
दर्शन क्या था? छात्र हर छह महीने में एक नए विषय में पारंगत हों और उसका मूल्यांकन वहीं समाप्त हो जाए।
हकीकत क्या है? मूल्यांकन की प्रक्रिया आज भी वही रटंत पद्धति पर आधारित है। कई विश्वविद्यालयों में तो छात्र का परिणाम 'ऑड' (Odd) और 'इवन' (Even) सेमेस्टर को जोड़कर निकाला जाता है, जबकि नियमतः हर सेमेस्टर अपने आप में एक स्वतंत्र इकाई (Independent Entity) होनी चाहिए।
2. ग्रेडिंग का मजाक: अंकों का मोह
जब किसी संस्थान ने 'ग्रेडिंग सिस्टम' अपना लिया, तो उसका अर्थ था कि हम छात्रों को अंकों की अंधी दौड़ से बाहर निकालकर उनकी दक्षता (Proficiency) के आधार पर आंकेंगे।
विसंगति: यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज भी कई यूनिवर्सिटीज अपनी ग्रेडशीट में 'ग्रेड' के बगल में 'अंक' (Marks) भी लिखती हैं। यह उस पूरे 'ऑर्डिनेंस' का उल्लंघन है जिसके तहत ग्रेडिंग लागू की गई थी। यदि अंत में अंकों के आधार पर ही तुलना करनी है, तो ग्रेडिंग का ढोंग क्यों?
3. 'सेमेस्टर ब्रेक' या सिर्फ छुट्टियाँ?
लेख का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'सेमेस्टर ब्रेक' के प्रति नजरिया है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर ब्रेक को 'वेकेशन' (छुट्टी) नहीं माना जाता।
संकाय के लिए: यह वह समय है जब शिक्षक पिछले सत्र की कमियों को दूर करे, नए शोध पढ़े और आने वाले सत्र के लिए 'पेडागोजी' (शिक्षण पद्धति) तैयार करे।
छात्रों के लिए: यह समय 'ब्रिज रीडिंग' और मानसिक ताज़गी के लिए होता है।
दुर्भाग्य से, हमारे प्रशासन को लगता है कि यदि कक्षाएं नहीं चल रही हैं, तो वह समय 'व्यर्थ' है। जब नीति-निर्धारकों को सिस्टम की बारीकियों का ज्ञान नहीं होता, तो वे 'सेमेस्टर ब्रेक' और 'गर्मियों की छुट्टियों' के बीच का अंतर भूल जाते हैं।
4. व्यवस्था का पतन: नेतृत्व का अभाव
इस विफलता का सबसे बड़ा कारण वह नेतृत्व है जो सिस्टम को तो बदल रहा है, लेकिन अपनी सोच को नहीं। "सिस्टम वैसे नहीं चलते जैसे वे कागज पर दिखते हैं, बल्कि वैसे चलते हैं जैसे उन्हें चलाने वाले समझते हैं।" यदि शीर्ष पदों पर बैठे लोग ही सेमेस्टर प्रणाली के मर्म से अनभिज्ञ हैं, तो व्यवस्था का ढहना निश्चित है।
निष्कर्ष
उच्च शिक्षा में सुधार केवल नई नियमावली (Ordinance) लाने से नहीं होगा। इसके लिए एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि 'सेमेस्टर' केवल परीक्षा लेने का तरीका नहीं, बल्कि सीखने और सिखाने का एक आधुनिक दृष्टिकोण है। जब तक हम 'मार्क्स' और 'एनुअल माइंडसेट' से बाहर नहीं निकलेंगे, हमारी डिग्रियां केवल कागज़ के टुकड़े बनी रहेंगी।
(लेखक गोरखपुर, कानपुर तथा जयपुर के विश्वविद्यालयों में कुलपति के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।)
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