देवबंद विधानसभा : धर्म, जाति और विकास के बीच चुनावी राजनीति का जटिल संतुलन
राजनीतिक विकासक्रम, सामाजिक-जातीय संरचना और समकालीन चुनावी विमर्श का विस्तृत विश्लेषण
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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित देवबंद विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र (संख्या-5) भारतीय राजनीति के मानचित्र पर केवल एक विधायी सीट नहीं है, बल्कि यह देश की धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और जातीय समीकरणों की प्रयोगशाला के रूप में उभरी है। देवबंद का नाम विश्व स्तर पर इस्लामिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र 'दारुल उलूम' के कारण प्रसिद्ध है, जो इस क्षेत्र की राजनीतिक पहचान को गहराई से प्रभावित करता है। ऐतिहासिक रूप से यह निर्वाचन क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र रहा है, जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और धार्मिक पहचान के बीच एक निरंतर संघर्ष दिखाई देता है। 2008 के परिसीमन के बाद यह सीट संख्या 5 के रूप में जानी जाती है, जबकि इससे पहले इसे संख्या 400 के रूप में पहचाना जाता था। इस क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से लेकर आधुनिक समय के तीखे चुनावी मुकाबलों तक फैला हुआ है, जिसमें ठाकुर (राजपूत) उम्मीदवारों का ऐतिहासिक वर्चस्व एक ऐसा तथ्य है जो यहाँ के उच्च मुस्लिम मतदाताओं की संख्या के बावजूद बना हुआ है।
ऐतिहासिक राजनीतिक पृष्ठभूमि और स्वतंत्रता पूर्व का प्रभाव
देवबंद की राजनीतिक चेतना की जड़ें 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना में निहित हैं। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1857 के विद्रोह की विफलता के बाद, इस संस्था का गठन केवल धार्मिक शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि भारतीय मुसलमानों को औपनिवेशिक दासता से मुक्त करने के एक बौद्धिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में किया गया था। संस्था के संस्थापकों, विशेष रूप से मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई और एक ऐसी विचारधारा को जन्म दिया जिसने बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'साझा राष्ट्रवाद' (Composite Nationalism) का समर्थन किया।
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में मौलाना महमूद-उल-हसन द्वारा संचालित 'रेशमी रूमाल आंदोलन' (Silk Letter Movement) देवबंद की राजनीतिक सक्रियता का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुर्की और अफगानिस्तान के सहयोग से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना था। हालांकि यह आंदोलन सफल नहीं हो सका, लेकिन इसने देवबंद को 'राष्ट्रवादी मुसलमानों' के गढ़ के रूप में स्थापित कर दिया। स्वतंत्रता के समय, देवबंदी उलेमाओं ने मुस्लिम लीग के 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' का पुरजोर विरोध किया, जिससे इस क्षेत्र की राजनीति में एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष और समावेशी आधार तैयार हुआ, जिसका लाभ प्रारंभिक दशकों में कांग्रेस पार्टी को मिला।
निर्वाचन क्षेत्र का विधायी इतिहास (1952-1990)
स्वतंत्रता के बाद 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में देवबंद ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ठाकुर फूल सिंह को अपना पहला प्रतिनिधि चुना। यह चुनाव क्षेत्र की उस राजनीतिक प्रवृत्ति की शुरुआत थी जहाँ उच्च जातियों, विशेष रूप से ठाकुरों को व्यापक समर्थन मिला। 1957 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार ठाकुर यशपाल सिंह ने जीत दर्ज की, जो यह दर्शाता था कि यहाँ की जनता पार्टी के बजाय उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव और सामाजिक प्रतिष्ठा को अधिक महत्व देती थी।
1960 और 1970 के दशक में कांग्रेस का प्रभाव बना रहा, हालांकि जनता पार्टी जैसी नई ताकतों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1977 में जनता पार्टी के मोहम्मद उस्मान ने जीत हासिल की, जो आपातकाल के बाद की लहर का परिणाम था। इसके बाद, 1980 के दशक में 'राणा' परिवार के उदय ने देवबंद की राजनीति को एक नया मोड़ दिया। महाबीर सिंह राणा ने कांग्रेस के टिकट पर 1980, 1985 और 1989 में लगातार चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पकड़ प्रदर्शित की। महाबीर सिंह राणा का प्रभाव क्षेत्र की सामाजिक संरचना और कृषि आधारित समुदायों के बीच उनके गहरे संबंधों पर आधारित था, जिसने कांग्रेस को एक लंबे समय तक यहाँ प्रासंगिक बनाए रखा।
देवबंद विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की ऐतिहासिक सूची
| वर्ष | निर्वाचित विधायक | राजनीतिक दल |
| 1952 | ठाकुर फूल सिंह | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1957 | ठाकुर यशपाल सिंह | निर्दलीय |
| 1962 | ठाकुर फूल सिंह | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1967 | हरदेव सिंह चौधरी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1969 | महाबीर सिंह राणा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1974 | महाबीर सिंह राणा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1977 | मोहम्मद उस्मान | जनता पार्टी |
| 1980 | महाबीर सिंह राणा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (I) |
| 1985 | महाबीर सिंह राणा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1989 | महाबीर सिंह राणा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1991 | वीरेंद्र सिंह | जनता दल |
| 1993 | शशि बाला पुंडीर | भारतीय जनता पार्टी |
| 1996 | सुखबीर सिंह पुंडीर | भारतीय जनता पार्टी |
| 2002 | राजेंद्र सिंह राणा | बहुजन समाज पार्टी |
| 2007 | मनोज चौधरी | बहुजन समाज पार्टी |
| 2012 | राजेंद्र सिंह राणा | समाजवादी पार्टी |
| 2016 (उपचुनाव) | माविया अली | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 2017 | बृजेश सिंह | भारतीय जनता पार्टी |
| 2022 | बृजेश सिंह | भारतीय जनता पार्टी |
मंडल-कमंडल युग और राजनीतिक संक्रमण (1991-2012)
1990 के दशक में भारत की राजनीति में आए मंडल और कमंडल के ज्वार ने देवबंद को भी अछूता नहीं छोड़ा। 1991 के चुनाव में जनता दल के वीरेंद्र सिंह ने जीत दर्ज की, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की राजनीति के बढ़ते प्रभाव का संकेत था। हालांकि, राम जन्मभूमि आंदोलन और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न धार्मिक ध्रुवीकरण ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए यहाँ रास्ता खोल दिया। 1993 में भाजपा की शशि बाला पुंडीर और 1996 में सुखबीर सिंह पुंडीर ने यहाँ से जीत हासिल की, जिससे पहली बार इस 'मुस्लिम बहुल' क्षेत्र में हिंदुत्व की राजनीति का स्पष्ट उदय हुआ।
21वीं सदी की शुरुआत में बहुजन समाज पार्टी (BSP) एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में उभरी। राजेंद्र सिंह राणा, जो पहले कांग्रेस और सपा में रह चुके थे, ने 2002 में बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की। 2007 में बसपा के ही मनोज चौधरी ने इस सीट को बरकरार रखा, जो मायावती के 'सोशल इंजीनियरिंग' फार्मूले की सफलता का प्रतीक था, जिसमें दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों को भी जोड़ा गया था। 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी की लहर के दौरान राजेंद्र सिंह राणा ने फिर से वापसी की और अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री बने। 2015 में उनके आकस्मिक निधन ने एक राजनीतिक शून्य पैदा किया, जिसे भरने के लिए 2016 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के माविया अली ने जीत हासिल की, जो अल्पसंख्यकों के बीच कांग्रेस की वापसी की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण घटना थी।
जातीय समीकरण: एक जटिल सामाजिक संरचना
देवबंद का चुनावी परिणाम यहाँ की जातीय और धार्मिक आबादी के बीच के सूक्ष्म संतुलन पर निर्भर करता है। यद्यपि यह क्षेत्र मुस्लिम मतदाताओं की उच्च संख्या के लिए जाना जाता है, लेकिन चुनावी जीत का गणित ठाकुरों और दलितों के समर्थन के बिना अधूरा रहता है।
मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका और विभाजन
देवबंद में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 90,000 से 1,00,000 के बीच अनुमानित है, जो कुल मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, यह मतदाता समूह राजनीतिक रूप से कई हिस्सों में विभाजित रहता है। यहाँ के मुसलमानों में 'पसमांदा' (पिछड़े) मुसलमानों की एक बड़ी संख्या है, जिनकी समस्याएं और चुनावी प्राथमिकताएं अक्सर उच्च वर्गीय अशराफ मुसलमानों से भिन्न होती हैं । इसके अतिरिक्त, देवबंदी और बरेलवी विचारधाराओं के बीच का अंतर भी मतदान के पैटर्न को प्रभावित करता है। अक्सर सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच मुस्लिम मतों के बिखराव का सीधा लाभ भाजपा को मिलता रहा है, जैसा कि 2017 के चुनाव परिणामों में स्पष्ट रूप से देखा गया।
ठाकुर (राजपूत) समुदाय का राजनीतिक प्रभुत्व
देवबंद की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहाँ लगभग 60,000 ठाकुर मतदाता होने के बावजूद, अब तक चुने गए विधायकों में से लगभग 90% इसी समुदाय से रहे हैं। ठाकुर समुदाय की यह सफलता उनकी सामाजिक एकजुटता, आर्थिक प्रभाव और अन्य हिंदू जातियों (जैसे ब्राह्मण और गुर्जर) के साथ गठबंधन बनाने की क्षमता का परिणाम है। ठाकुर उम्मीदवार अक्सर स्वयं को एक 'विकासवादी' नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सांप्रदायिक राजनीति से ऊपर उठकर काम कर सकते हैं, जिससे उन्हें मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग का भी समर्थन मिल जाता है।
दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
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लगभग 65,000 दलित मतदाताओं के साथ, यह समुदाय बसपा का पारंपरिक आधार रहा है
अनुमानित जातीय संरचना (2022 के आधार पर)
| जाति/समुदाय | अनुमानित मतदाता संख्या | प्रभाव का स्तर |
| मुस्लिम | 95,000 | अत्यंत उच्च (परंतु विभाजित) |
| दलित | 65,000 | उच्च (बसपा/भाजपा के बीच) |
| ठाकुर (राजपूत) | 60,000 | अत्यंत उच्च (विधायी प्रतिनिधित्व में प्रमुख) |
| गुर्जर | 40,000 | मध्यम (निर्णायक स्विंग फैक्टर) |
| ब्राह्मण | 35,000 | मध्यम |
| अन्य (सैनी, त्यागी, आदि) | 15,000 | संतुलित |
समकालीन चुनावी विश्लेषण: 2017 और 2022 का दौर
पिछले दो विधानसभा चुनावों ने देवबंद की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह से बदल दिया है, जहाँ वैचारिक ध्रुवीकरण ने स्थानीय मुद्दों पर बढ़त हासिल की है।
2017: ध्रुवीकरण और भाजपा की ऐतिहासिक जीत
2017 का चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि था। पार्टी ने बृजेश सिंह को मैदान में उतारा, जिन्होंने 1,02,244 मतों के साथ शानदार जीत दर्ज की। इस जीत के पीछे का मुख्य कारण मुस्लिम मतों का तीन प्रमुख उम्मीदवारों के बीच जबरदस्त विभाजन था। बसपा के माजिद अली को 72,844 और सपा-कांग्रेस गठबंधन के माविया अली को 55,385 मत मिले। यदि इन दोनों के मतों को जोड़ दिया जाए, तो वे भाजपा से कहीं अधिक थे। इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि 'त्रिकोणीय' या 'चतुष्कोणीय' मुकाबले में भाजपा की जीत की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
2022: कड़ा मुकाबला और भाजपा का वर्चस्व बरकरार
2022 के चुनाव में परिस्थितियां बदली हुई थीं। समाजवादी पार्टी ने रालोद के साथ गठबंधन किया और दिवंगत राजेंद्र सिंह राणा के पुत्र कार्तिकेय राणा को टिकट दिया। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही रहा। बृजेश सिंह को 93,890 (38.77%) मत मिले, जबकि कार्तिकेय राणा ने 86,786 (35.83%) मत प्राप्त किए। भाजपा की जीत का अंतर घटकर केवल 7,104 रह गया, जो दर्शाता है कि विपक्ष ने मुस्लिम और गुर्जर मतों को एकजुट करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की थी। बसपा इस बार तीसरे स्थान पर खिसक गई, जिससे उसका दलित आधार भाजपा और सपा की ओर स्थानांतरित होता हुआ दिखाई दिया।
| उम्मीदवार (2022) | दल | प्राप्त मत | मत प्रतिशत |
| बृजेश सिंह | भाजपा | 93,890 | 38.77% |
| कार्तिकेय राणा | सपा | 86,786 | 35.83% |
| चौधरी राजेंद्र सिंह | बसपा | 52,732 | 21.77% |
| मौलाना उमैर मदनी | AIMIM | 3,501 | 1.45% |
प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व और नेतृत्व
देवबंद की राजनीति कुछ प्रभावशाली परिवारों और नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती है जिन्होंने अपनी पहचान स्थानीय समीकरणों और राज्य स्तर की राजनीति के बीच बनाई है।
बृजेश सिंह (भाजपा)
वर्तमान विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग के राज्य मंत्री बृजेश सिंह ने अपनी राजनीति की शुरुआत आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी से की थी। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक मजबूत चेहरे के रूप में उभरे हैं। उनकी कार्यशैली और आक्रामक हिंदुत्व की छवि ने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का विश्वासपात्र बनाया है। 2017 में जीत के तुरंत बाद देवबंद का नाम बदलकर 'देववृंद' करने का उनका प्रस्ताव उनकी इसी राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा था।
राणा परिवार का उत्तराधिकार
राजेंद्र सिंह राणा के निधन के बाद उनके पुत्र कार्तिकेय राणा ने उनकी विरासत को संभाला है। कार्तिकेय राणा एक शिक्षित युवा नेता हैं (JIIT नोएडा से B.Tech), जिन्होंने 2022 में अपने पहले ही चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दी। उनके पास अपने पिता की बनाई हुई वह छवि है जो हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच स्वीकार्य है। उनका मुख्य ध्यान कृषि संकट और ग्रामीण विकास पर रहा है।
माविया अली और कांग्रेस का संघर्ष
माविया अली देवबंद के एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने समय-समय पर अपनी राजनीतिक निष्ठाएं बदली हैं। 2016 में कांग्रेस के टिकट पर जीतने के बाद वे सपा में शामिल हो गए थे। वे अपने विवादित बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं, जिसने कई बार भाजपा को उनके खिलाफ ध्रुवीकरण करने का मौका दिया है । उनकी राजनीतिक यात्रा देवबंद में कांग्रेस के कमजोर होते आधार और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत का प्रतिबिंब है।
प्रमुख राजनीतिक हलचल और बड़े विवाद
देवबंद अपनी धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अक्सर विवादों और हलचलों का केंद्र बना रहता है, जिसका सीधा असर चुनावी माहौल पर पड़ता है।
नाम बदलने का विवाद: देवबंद बनाम देववृंद
मार्च 2017 में भाजपा विधायक बृजेश सिंह द्वारा देवबंद का नाम बदलकर 'देववृंद' करने के प्रस्ताव ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि इस स्थान का पौराणिक संबंध महाभारत काल से है और इसका मूल नाम भगवान कृष्ण और पांडवों से जुड़ा हुआ है। इस प्रस्ताव को अल्पसंख्यकों द्वारा अपनी पहचान पर हमले के रूप में देखा गया, जबकि भाजपा समर्थकों ने इसे 'सांस्कृतिक गौरव' की वापसी के रूप में सराहा। हालांकि आधिकारिक तौर पर नाम नहीं बदला गया, लेकिन यह मुद्दा ध्रुवीकरण का एक स्थायी हथियार बन गया है।
2014 के सहारनपुर दंगे और उनका प्रभाव
जुलाई 2014 में सहारनपुर शहर में एक गुरुद्वारे की भूमि को लेकर सिखों और मुसलमानों के बीच हुए हिंसक दंगों ने पूरे जिले के सांप्रदायिक सौहार्द को हिला दिया था। इन दंगों में तीन लोगों की मौत हुई और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ। समाजवादी पार्टी की सरकार पर तुष्टीकरण के आरोप लगे, जबकि भाजपा पर दंगे भड़काने के आरोप लगाए गए। इन दंगों की छाया 2017 के चुनावों पर स्पष्ट रूप से देखी गई, जहाँ सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर हिंदू मतदाताओं का भारी ध्रुवीकरण हुआ।
जातिगत हिंसा (2017): दलित-ठाकुर संघर्ष
मई 2017 में देवबंद के पड़ोसी क्षेत्रों (जैसे शब्बीरपुर) में दलितों और ठाकुरों के बीच हुई हिंसा ने एक नया सामाजिक संकट पैदा किया । महाराणा प्रताप जयंती पर निकाली गई शोभायात्रा को लेकर हुए इस विवाद ने भीम आर्मी और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेतृत्व को जन्म दिया । इस हिंसा ने दलितों और सवर्ण जातियों के बीच की खाई को गहरा कर दिया, जिससे भाजपा के उस 'हिंदू एकता' के दावों को चुनौती मिली जिसे उसने 2017 के विधानसभा चुनाव में सफलतापूर्वक पेश किया था।
धार्मिक फतवे और राजनीतिक प्रतिक्रिया
दारुल उलूम देवबंद द्वारा समय-समय पर जारी किए गए फतवे, चाहे वे महिलाओं की शिक्षा को लेकर हों या हाल ही में 'गजवा-ए-हिंद' को लेकर, अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनते हैं । भाजपा इन फतवों को देश की सुरक्षा और प्रगति के लिए खतरा बताकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने का प्रयास करती है। दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय के नेता इसे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप और राजनीतिक द्वेष की संज्ञा देते हैं।
सामाजिक-आर्थिक मुद्दे और कृषि राजनीति
देवबंद केवल धार्मिक पहचान का शहर नहीं है, बल्कि यह गन्ने की खेती और लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving) का भी एक बड़ा केंद्र है। यहाँ की जनता के लिए चुनावी मुद्दे केवल मंदिर-मस्जिद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी आजीविका से जुड़े संकट भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
गन्ना भुगतान और किसानों का असंतोष
गन्ना उत्पादकों के लिए बकाया भुगतान एक स्थायी समस्या है। सहारनपुर जिले की चीनी मिलों पर किसानों के करोड़ों रुपये बकाया रहते हैं, जिसके लिए अक्सर जिलाधिकारी कार्यालय और मिलों के गेट पर विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं। 2023 और 2024 में किसानों ने गन्ने के मूल्यों की घोषणा में देरी को लेकर अनिश्चितकालीन धरना दिया। भाजपा ने 2017 में वादा किया था कि 14 दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा, लेकिन धरातल पर देरी और ब्याज न मिलने की शिकायतों ने किसानों के एक बड़े वर्ग को सरकार के खिलाफ खड़ा किया है।
औद्योगिक गिरावट और बेरोजगारी
सहारनपुर का प्रसिद्ध लकड़ी नक्काशी उद्योग, जो कभी ₹1,400 करोड़ का व्यापार करता था, अब घटकर ₹1,000 करोड़ के आसपास सिमट गया है। बिजली की बढ़ती कीमतें, जीएसटी और कच्चे माल की कमी ने देवबंद के मुस्लिम शिल्पकारों और हिंदू व्यापारियों दोनों को प्रभावित किया है
बुनियादी ढांचा और बाढ़ की समस्या
देवबंद विधानसभा के कई ग्रामीण क्षेत्र मानसून के दौरान नदियों के जलस्तर बढ़ने से अलग-थलग पड़ जाते हैं। सड़कों की जर्जर स्थिति और पर्याप्त पुलों का अभाव आज भी एक बड़ी चुनौती है। मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यह शिकायत करता रहा है कि 'नंबर एक विधानसभा' होने के बावजूद यहाँ के बुनियादी ढांचे में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
दारुल उलूम देवबंद की राजनीतिक तटस्थता और वास्तविकता
राजनीतिक हलकों में यह धारणा आम है कि दारुल उलूम चुनावी नतीजों को नियंत्रित करता है, लेकिन वास्तविकता अधिक सूक्ष्म है। दारुल उलूम का प्रबंधन आधिकारिक तौर पर किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन करने या फतवा जारी करने से बचता है। वे स्वयं को एक शैक्षणिक और आध्यात्मिक संस्था के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
हालांकि, दारुल उलूम से जुड़े संगठन जैसे 'जमियत उलेमा-ए-हिंद' की राजनीतिक प्राथमिकताएं स्पष्ट होती हैं। वे ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस और हाल के वर्षों में समाजवादी पार्टी के करीब रहे हैं। देवबंद के उलेमाओं का प्रभाव केवल देवबंद सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत के मुसलमानों के बीच उनकी बात सुनी जाती है। यही कारण है कि चुनाव के समय राष्ट्रीय स्तर के नेता देवबंद का दौरा करते हैं, जिसका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं को एक संकेत देना होता है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
देवबंद विधानसभा का राजनीतिक इतिहास सामाजिक विविधता और वैचारिक संघर्ष की एक अनूठी गाथा है। यहाँ की राजनीति का केंद्र बिंदु धार्मिक पहचान (दारुल उलूम) और जातीय वर्चस्व (ठाकुर प्रतिनिधित्व) के बीच का संतुलन है। पिछले एक दशक में भाजपा ने यहाँ हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के माध्यम से एक मजबूत आधार तैयार किया है, जिसने पारंपरिक रूप से मजबूत सपा और बसपा के दुर्ग को ध्वस्त कर दिया है।
भविष्य की राजनीति में, देवबंद में 'पसमांदा' मुसलमानों का उदय और दलित-पिछड़ा वर्ग के वोटों का पुनर्गठन महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ ही, गन्ने के बकाये और बेरोजगारी जैसे आर्थिक मुद्दे भी अपनी जगह बनाने का प्रयास करेंगे। देवबंद केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि यह इस बात का पैमाना बना रहेगा कि भारत में धार्मिक पहचान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच का रिश्ता किस दिशा में जा रहा है। यहाँ की जनता ने बार-बार दिखाया है कि वे ध्रुवीकरण के शोर के बीच भी अपने स्थानीय हितों और नेतृत्व की गुणवत्ता को पहचानना जानते हैं।
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