सहारनपुर देहात विधानसभा
राजनीतिक इतिहास, सामाजिक-जनसांख्यिकीय संरचना और चुनावी द्वंद का विस्तृत विश्लेषण
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उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मानचित्र पर सहारनपुर जिला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील भौगोलिक इकाई के रूप में स्थापित है। इस जिले की सात विधानसभा सीटों में से 'सहारनपुर देहात' (निर्वाचन संख्या 004) अपनी विशिष्ट जनसांख्यिकीय बनावट, जटिल जातिगत समीकरणों और समय-समय पर उत्पन्न होने वाली राजनीतिक हलचलों के कारण न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी रहती है । यह निर्वाचन क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस 'चीनी पट्टी' (Sugar Belt) का हिस्सा है जहाँ गन्ने की खेती और किसान आंदोलन राजनीति की दिशा तय करते हैं । सहारनपुर देहात का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र के क्रमिक विकास, कांग्रेस के प्रभुत्व के अवसान, क्षेत्रीय दलों के उदय और हालिया वर्षों में भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक पैठ की एक विस्तृत गाथा प्रस्तुत करता है।
भौगोलिक अवस्थिति और जनसांख्यिकीय प्रभाव
सहारनपुर देहात विधानसभा क्षेत्र की राजनीति को समझने के लिए इसकी भौगोलिक और पारिस्थितिक संरचना को समझना अनिवार्य है। यह जनपद यमुना और हिंडन नदियों के उपजाऊ दोआब के उत्तर-पश्चिम छोर पर स्थित है । इसके उत्तर में शिवालिक की पहाड़ियाँ देहरादून से प्राकृतिक सीमा बनाती हैं, जबकि पश्चिम में यमुना नदी हरियाणा के साथ सीमा साझा करती है । यह क्षेत्र मुख्य रूप से 'बांगर' और 'खादर' में विभाजित है। बांगर क्षेत्र समतल और उपजाऊ है जहाँ अधिकांश जनसंख्या निवास करती है और कृषि कार्य में संलग्न है, जबकि खादर क्षेत्र यमुना के तटवर्ती इलाकों में स्थित है जो अक्सर बाढ़ की चपेट में रहता है ।
जलवायु की दृष्टि से यहाँ की उष्णकटिबंधीय उप-आर्द्र जलवायु गन्ने, गेहूं और चावल की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है । कृषि की इस प्रधानता ने क्षेत्र में एक सशक्त किसान वर्ग को जन्म दिया है, जो चुनावों के दौरान एक संगठित वोट बैंक के रूप में कार्य करता है। यहाँ की मिट्टी की उर्वरता ने समुदायों के बीच भूमि के मालिकाना हक को लेकर एक सामाजिक श्रेणीबद्धता भी पैदा की है, जहाँ ऐतिहासिक रूप से राजपूतों के पास बड़ी जोतें रही हैं, जबकि दलित और पिछड़े वर्गों का भू-स्वामित्व तुलनात्मक रूप से कम रहा है।
सहारनपुर की कुल जनसंख्या वितरण उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों से भिन्न है। यहाँ मुस्लिम (लगभग 41-42.5%) और दलित (लगभग 26%) समुदायों की प्रधानता है, जो मिलकर एक बहुत बड़ा सामाजिक ब्लॉक बनाते हैं । इस जनसांख्यिकीय संरचना का सीधा प्रभाव निर्वाचन क्षेत्र संख्या 004 की राजनीति पर पड़ता है, जहाँ 'दलित-मुस्लिम' गठजोड़ अक्सर जीत की कुंजी साबित होता रहा है।
प्रमुख समुदाय और जनसांख्यिकीय आंकड़े
सहारनपुर जिले और विशेष रूप से देहात क्षेत्र में समुदायों की विविधता और उनकी संख्यात्मक स्थिति को निम्नलिखित आंकड़ों के माध्यम से समझा जा सकता है। ये आंकड़े निर्वाचन क्षेत्र के भीतर चुनावी रणनीतियों और टिकट वितरण के आधार बनते हैं।
| समुदाय | प्राथमिक धर्म/परंपरा | अनुमानित जनसंख्या (जिला स्तर पर) |
| चमार | हिंदू परंपरा |
6,30,000 |
| तेली | मुस्लिम परंपरा |
2,06,000 |
| अंसारी | मुस्लिम (उर्दू भाषी) |
1,81,000 |
| राजपूत | मुस्लिम परंपरा |
1,11,000 |
| कहार | हिंदू परंपरा |
1,07,000 |
| सैनी | हिंदू परंपरा |
93,000 |
| ब्राह्मण | हिंदू (अनिश्चित/विभिन्न) |
88,000 |
| बनिया | हिंदू (अनिश्चित) |
79,000 |
| राजपूत | हिंदू परंपरा |
75,000 |
| गुर्जर | हिंदू/मुस्लिम |
महत्वपूर्ण स्थानीय उपस्थित |
इन समुदायों की भौगोलिक सघनता भी अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, दबकी गुज्जर जैसे क्षेत्रों में गुर्जर समुदाय का प्रभाव अधिक है, जबकि पुंवारका और हरोरा जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम और दलित आबादी का बाहुल्य है।
प्रशासनिक इतिहास और निर्वाचन क्षेत्र का गठन
सहारनपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र का अस्तित्व 1955 में "अंतिम आदेश डीसी (1953-1955)" के माध्यम से सामने आया था। समय-समय पर होने वाले परिसीमन ने इसके स्वरूप और निर्वाचन संख्या में परिवर्तन किए। 'सहारनपुर देहात' शब्द का प्रयोग अक्सर उन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए किया जाता है जो मुख्य शहर की सीमाओं से बाहर हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से निर्वाचन संख्या 4 को ही वर्तमान में सहारनपुर (देहात) के संदर्भ में देखा जाता है। परिसीमन आदेश 2008 के अनुसार, इस निर्वाचन क्षेत्र में निम्नलिखित प्रमुख वार्ड और क्षेत्र शामिल किए गए हैं:
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दबकी गुज्जर
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दारा अली
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दारा शिवपुरी
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हरोरा
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मानक मऊ
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मेघ छप्पर
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पठानपुर
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पुंवारका
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निर्वाचन क्षेत्र के इस पुनर्गठन ने यहाँ के चुनावी चरित्र को स्थायी रूप से बदल दिया। पुराने समय में जहाँ यह क्षेत्र एक व्यापक सहारनपुर सदर का हिस्सा हुआ करता था, वहीं परिसीमन के बाद यह शुद्ध रूप से ग्रामीण और उप-नगरीय मुद्दों पर केंद्रित हो गया।
राजनीतिक विकासक्रम: 1957 से 2007 तक का कालखंड
सहारनपुर की राजनीति के शुरुआती दशकों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पूर्ण वर्चस्व रहा। 1957 के पहले निर्वाचित विधायक मंजूरुल नबी थे, जिन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी। यह वह समय था जब नेहरूवादी समाजवाद और कांग्रेस की सर्व-समावेशी छवि ने अल्पसंख्यकों और दलितों को एक साथ जोड़े रखा था।
हालांकि, 1962 में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब स्वतंत्र उम्मीदवार ब्रह्म दत्त मेयर ने कांग्रेस को हराकर यह संकेत दिया कि स्थानीय नेतृत्व और व्यक्तिगत छवि दलीय विचारधारा पर हावी हो सकती है। लेकिन यह बदलाव क्षणिक था और 1967 में अब्दुल खालिक के माध्यम से कांग्रेस ने पुनः सत्ता प्राप्त की। 1960 के दशक के अंत तक भारतीय जनसंघ जैसी विचारधाराओं ने भी यहाँ अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दी थीं। 1969 में जनसंघ के जगन्नाथ खन्ना की जीत ने क्षेत्र में हिंदुत्ववादी राजनीति की पहली महत्वपूर्ण पदचाप छोड़ी।
1970 और 80 के दशक के दौरान, यह सीट कांग्रेस और जनता पार्टी/लोकदल के बीच झूलती रही। 1974 में कांग्रेस के एस. कुलतार सिंह ने जीत हासिल की, लेकिन 1977 की 'जनता लहर' में सुमेर चंद ने कांग्रेस के इस गढ़ को ढहा दिया।1980 के दशक में इंदिरा गांधी की वापसी के साथ ही कांग्रेस के सुरेंद्र कपिल ने पुनः जीत हासिल की, लेकिन 1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुए राम जन्मभूमि आंदोलन और मंडल आयोग की सिफारिशों ने यहाँ के राजनीतिक परिदृश्य को मौलिक रूप से परिवर्तित कर दिया।
1990 के दशक में सहारनपुर देहात क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की शक्ति में निरंतर वृद्धि हुई। इस दौरान राघव लखनपाल जैसे नेताओं का उदय हुआ, जिन्होंने शहरी और ग्रामीण मतों के बीच एक संतुलन साधने का प्रयास किया। 2007 के चुनाव में भाजपा के राघव लखनपाल ने सपा के संजय गर्ग को एक कड़े मुकाबले में हराया था।
ऐतिहासिक चुनावी परिणामों का तुलनात्मक विवरण (1957-2007)
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| चुनाव वर्ष | विजेता उम्मीदवार | राजनीतिक दल | प्रतिद्वंद्वी/समीकरण |
| 1957 | मंजूरुल नबी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
नेहरूवादी प्रभाव का दौर |
| 1962 | ब्रह्म दत्त मेयर | निर्दलीय |
स्थानीय छवि की प्रधानता |
| 1967 | अब्दुल खालिक | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
कांग्रेस की वापसी |
| 1969 | जगन्नाथ खन्ना | भारतीय जनसंघ |
हिंदुत्ववादी राजनीति का उदय |
| 1974 | एस. कुलतार सिंह | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
राजनीतिक अस्थिरता का दौर |
| 1977 | सुमेर चंद | जनता पार्टी |
आपातकाल विरोधी लहर |
| 1980 | सुरेंद्र कपिल | कांग्रेस (आई) |
इंदिरा गांधी की वापसी |
| 2007 | राघव लखनपाल | भारतीय जनता पार्टी |
सपा के साथ सीधा मुकाबला |
मंडल और कमंडल के बाद की राजनीति (2008-2022)
परिसीमन के बाद सहारनपुर देहात निर्वाचन क्षेत्र एक नए और अधिक चुनौतीपूर्ण रूप में उभरा। अब यहाँ का मुख्य मुकाबला बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और भाजपा के बीच केंद्रित हो गया। कांग्रेस ने भी इमरान मसूद के उदय के साथ यहाँ अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई।
2012 का चुनाव: बसपा का सामाजिक इंजीनियरिंग प्रयोग
2012 के विधानसभा चुनाव में सहारनपुर देहात में मायावती की 'सोशल इंजीनियरिंग' की परीक्षा हुई। बसपा ने जगपाल सिंह को मैदान में उतारा, जिन्होंने दलित-मुस्लिम-ओबीसी गठजोड़ के सहारे भारी जीत हासिल की।
2012 चुनाव परिणाम विश्लेषण:
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जगपाल सिंह (बसपा): 80,670 वोट (39.57%)
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अब्दुल वाहिद (कांग्रेस): 63,557 वोट (31.17%)
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अब्दुल सरफराज खान (सपा): 43,018 वोट (21.10%)
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विक्रम सिंह (भाजपा): 10,739 वोट (5.27%)
इस चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों में उस समय काफी कमजोर थी, जबकि कांग्रेस इमरान मसूद के प्रभाव के चलते मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी थी।
2017 का चुनाव: गठबंधन और विपरीत लहर में जीत
2017 का चुनाव उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर था, जहाँ भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। हालांकि, सहारनपुर देहात की जनता ने इस लहर के विपरीत मतदान किया। सपा-कांग्रेस गठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस के खाते में गई और मसूद अख्तर विजयी हुए।
2017 चुनाव परिणाम विश्लेषण:
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मसूद अख्तर (कांग्रेस): 87,689 वोट (36.93%)
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जगपाल सिंह (बसपा): 75,365 वोट (31.74%)
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मनोज चौधरी (भाजपा): 58,752 वोट (24.74%)
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सादाद अली खान (निर्दलीय): 10,950 वोट (4.61%)
इस चुनाव में भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि (5% से 24.7%) की, लेकिन मसूद अख्तर ने इमरान मसूद की लोकप्रियता और मुस्लिम-दलित मतों के ध्रुवीकरण के कारण सीट निकालने में सफलता पाई।
2022 का चुनाव: सपा का पुनरुद्धार और आशु मलिक का आगमन
2022 के चुनाव से पहले सहारनपुर की राजनीति में बड़े दलबदल हुए। मौजूदा विधायक मसूद अख्तर और उनके भाई इमरान मसूद कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल हो गए। हालांकि, सपा ने मसूद अख्तर को टिकट न देकर आशु मलिक को मैदान में उतारा, जो अखिलेश यादव के अत्यंत विश्वसनीय माने जाते हैं। वहीं, भाजपा ने पूर्व बसपा विधायक जगपाल सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया, जिससे मुकाबला और भी रोचक हो गया।
2022 चुनाव परिणाम विश्लेषण:
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आशु मलिक (सपा): 1,07,007 वोट (41.18%)
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जगपाल (भाजपा): 76,262 वोट (29.35%)
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अजब सिंह चौधरी (बसपा): 62,637 वोट (24.10%)
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मरगूब हसन (AIMIM): 8,187 वोट (3.15%)
यह परिणाम दर्शाता है कि क्षेत्र में द्विध्रुवी राजनीति का उदय हुआ है, जहाँ भाजपा और सपा मुख्य खिलाड़ी बनकर उभरे हैं और बसपा तीसरे स्थान पर खिसक गई है।
जातिगत समीकरणों का सूक्ष्म विश्लेषण
सहारनपुर देहात की चुनावी गणित मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी है: मुस्लिम, दलित, गुर्जर/सैनी और उच्च जातियाँ।
मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक व्यवहार
निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम आबादी लगभग 41% है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से कांग्रेस या बसपा का समर्थक रहा है, लेकिन 2022 में इसने एकजुट होकर सपा के पक्ष में मतदान किया। मुस्लिम मतदाताओं के भीतर भी जातीय विभाजन है, जैसे अंसारी, कुरैशी और तेली, जो अक्सर स्थानीय उम्मीदवारों के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं बदलते हैं।
दलित वोट बैंक और भीम आर्मी का प्रभाव
सहारनपुर जिले में 26% दलित आबादी है, जिसमें चमार समुदाय सबसे बड़ा समूह है। मायावती का गढ़ होने के बावजूद, हाल के वर्षों में चंद्रशेखर आज़ाद और उनकी भीम आर्मी ने दलित युवाओं के बीच एक नई चेतना जगाई है। 2017 की शब्बीरपुर हिंसा के बाद दलितों का भाजपा के प्रति मोहभंग हुआ था, लेकिन 2022 में भाजपा ने जगपाल सिंह के माध्यम से इस वर्ग में पुनः पैठ बनाने की कोशिश की।
पिछड़ा वर्ग (OBC): सैनी और गुर्जर
सैनी और गुर्जर समुदायों की इस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका है। सैनी समुदाय अक्सर भाजपा और बसपा के बीच विभाजित रहता है, जबकि गुर्जर समुदाय की भूमिका स्थानीय नेतृत्व पर निर्भर करती है। 2022 में भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत की, जिससे उसका वोट प्रतिशत लगभग 30% तक पहुँच गया।
प्रमुख राजनीतिक हलचलें और विवाद
सहारनपुर देहात का राजनीतिक इतिहास तीखे विवादों और सामाजिक तनाव की घटनाओं से भी भरा रहा है, जिसने चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया है।
शब्बीरपुर जातीय हिंसा (2017)
मई 2017 में शब्बीरपुर गाँव में दलित और राजपूत समुदायों के बीच हुई हिंसक झड़प क्षेत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचलों में से एक थी। महाराणा प्रताप जयंती के जुलूस के दौरान भड़की इस हिंसा में कई दलितों के घर जला दिए गए और एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इस घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भीम आर्मी को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया और दलितों के सामाजिक प्रतिरोध को एक नई दिशा दी। राजनीतिक रूप से, इस घटना ने भाजपा के 'हिंदू एकता' के नारे को चुनौती दी और दलितों को विपक्ष की ओर धकेला।
इमरान मसूद और दलबदल की राजनीति
इमरान मसूद सहारनपुर की राजनीति के धुरी बने हुए हैं। 2014 के चुनाव में उनके "बोटी-बोटी" वाले बयान ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विवादों में ला दिया था । 2022 के चुनाव से ठीक पहले उनका कांग्रेस छोड़ना, सपा में जाना और फिर बसपा में शामिल होना (और बाद में पुनः कांग्रेस में वापसी) सहारनपुर देहात की अस्थिर राजनीतिक वफादारियों का सटीक उदाहरण है। उनके हर कदम का असर देहात विधानसभा के मुस्लिम मतदाताओं पर पड़ता है।
किसान आंदोलन और गन्ने की राजनीति
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हिस्सा होने के नाते, सहारनपुर देहात 2020-21 के किसान आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। कृषि कानूनों के विरोध ने जाट, मुस्लिम और गुर्जर किसानों को एक साझा मंच पर ला खड़ा किया, जिसने भाजपा की पारंपरिक 'हिंदू पहचान' वाली राजनीति को ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर किया। गन्ने के भुगतान में देरी और बिजली की बढ़ती दरें यहाँ के स्थायी चुनावी मुद्दे रहे हैं, जो अक्सर सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल बनाने में सहायक होते हैं।
शासन और विकास के मुद्दे
सहारनपुर देहात की जनता के लिए राजनीति केवल जाति और धर्म तक सीमित नहीं है। ग्रामीण बुनियादी ढांचा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी मतदान को प्रभावित करती है।
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गन्ना खेती: जिले की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है और मुख्य फसल गन्ना है। किसानों के लिए समय पर भुगतान और चीनी मिलों की कार्यक्षमता हमेशा चुनावी घोषणापत्रों का हिस्सा होती है।
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कानून-व्यवस्था: हाल के वर्षों में, भाजपा सरकार ने अपराध नियंत्रण और सुरक्षा को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। आंकड़ों के अनुसार, 2022 में बड़ी संख्या में व्यापारियों और ग्रामीण निवासियों ने सुरक्षा के नाम पर भाजपा का समर्थन किया।
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सड़क और कनेक्टिविटी: पुंवारका और हरोरा जैसे क्षेत्रों में सड़कों की स्थिति और सहारनपुर शहर से उनकी कनेक्टिविटी विकास के मापदंडों में शामिल है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
सहारनपुर देहात विधानसभा का राजनीतिक इतिहास एक निरंतर बदलते सामाजिक समीकरण की कहानी है। जहाँ एक ओर यहाँ पुरानी सामंती संरचनाएं (राजपूत-ब्राह्मण प्रभाव) अभी भी मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर दलित और पिछड़ी जातियों का बढ़ता राजनीतिक रसूख सत्ता के नए केंद्र बना रहा है। 2022 के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह निर्वाचन क्षेत्र अब सपा और भाजपा के बीच वैचारिक और सामाजिक ध्रुवीकरण का प्रमुख युद्धक्षेत्र बन गया है।
आशु मलिक की वर्तमान जीत सपा की संगठनात्मक मजबूती और मुस्लिम-दलित एकत्रीकरण का परिणाम है, लेकिन भाजपा का निरंतर बढ़ता वोट बैंक और बसपा का खिसकता जनाधार भविष्य में नए गठबंधन की संभावनाओं को जन्म दे सकता है। आगामी चुनावों में भीम आर्मी जैसे संगठनों की भूमिका और किसान यूनियनों का रुख यह तय करेगा कि सहारनपुर देहात की राजनीति में किसका पलड़ा भारी रहेगा। अंततः, इस क्षेत्र की नियति उन जटिल अंतर्संबंधों से तय होगी जो जाति, धर्म और कृषि संबंधी मुद्दों के बीच निरंतर विकसित हो रहे हैं।
सहारनपुर देहात की राजनीति का सूक्ष्म अध्ययन यह दर्शाता है कि यहाँ का मतदाता न केवल अपनी पहचान के प्रति सचेत है, बल्कि वह बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और उम्मीदवारों की विश्वसनीयता के आधार पर रणनीतिक मतदान करने में भी निपुण है। यह निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश की राजनीति की उस नब्ज को दर्शाता है जहाँ परंपरा और आधुनिकता, संघर्ष और सामंजस्य एक साथ चलते हैं।
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