रक्षाबंधन: राष्ट्र रक्षा के संकल्प का पर्व, जैन परंपरा में 700 मुनियों की रक्षा की अनूठी कथा
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में रक्षा, करुणा, सामाजिक एकता और राष्ट्र रक्षा के संकल्प का प्रतीक भी है। जैन परंपरा में रक्षाबंधन का संबंध आचार्य अकम्पनाचार्य के 700 मुनियों पर आए उपसर्ग और मुनि विष्णु कुमार द्वारा उनकी रक्षा किए जाने की कथा से जोड़ा जाता है। इसी प्रसंग से रक्षा-सूत्र बांधने तथा सवैया, घेवर और फैनी जैसे पकवानों के प्रचलन की मान्यता भी बताई जाती है। प्रस्तुत आलेख में जैन धर्म की इस महत्वपूर्ण परंपरा का विस्तार से वर्णन किया गया है।
राष्ट्र रक्षा के संकल्प का पर्व : रक्षाबंधन
इंजी. कवि अतिवीर जैन 'पराग'
पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय, मेरठ
रक्षाबंधन अर्थात रक्षा करने का संकल्प। रक्षा-सूत्र के रूप में धागा कलाई पर बांधा जाता है, जिसका भावार्थ एक-दूसरे की सुरक्षा और कल्याण का संकल्प है। सामान्यतः इसे भाई-बहन के पवित्र संबंध से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र का व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व भी रहा है। बहन भाई को ही नहीं, बहनें एक-दूसरे को तथा पिता, चाचा, भतीजे और भांजे को भी राखी बांध सकती हैं। पुरुष भी पिता-पुत्र, भाई-भाई अथवा अन्य आत्मीयजनों को रक्षा-सूत्र बांध सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी स्वयंसेवक एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बांधकर समाज और राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेते हैं। इस प्रकार राखी केवल पारिवारिक संबंध का प्रतीक न रहकर सामाजिक सौहार्द, एकता और परस्पर दायित्व का प्रतीक बन जाती है।
रक्षाबंधन हिंदू धर्म का प्राचीन पर्व है और वैदिक परंपरा में इसकी अनेक कथाएं मिलती हैं। जैन धर्म में भी रक्षाबंधन से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथा प्रचलित है। विशेष बात यह है कि जैन और वैदिक परंपरा में राजा बलि तथा वामन का प्रसंग मिलता है, हालांकि दोनों कथाओं का स्वरूप अलग-अलग है।
जैन परंपरा के अनुसार उज्जैन के राजा श्री वर्मा के दरबार में बलि, नमुचि, बृहस्पति और प्रह्लाद नामक चार मंत्री थे। वे जैन धर्म के विरोधी थे। इसी दौरान आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ मुनि शिष्यों के साथ विहार करते हुए उज्जैन पहुंचे और नगर के बाहर एक उद्यान में ठहरे।
आचार्य श्री ने अपने ध्यान से जान लिया कि नगर के मंत्री जैन धर्म के विरोधी हैं। उन्होंने मुनियों को मौन रहने, वाद-विवाद से दूर रहने और ध्यान में लीन रहने की आज्ञा दी। उस समय श्रुतकीर्ति मुनि आहार के लिए नगर गए हुए थे, इसलिए उन्हें गुरु की आज्ञा की जानकारी नहीं थी।
राजा श्री वर्मा धार्मिक प्रवृत्ति के थे। मुनियों के नगर के बाहर ठहरने का समाचार पाकर वे उनके दर्शन के लिए गए। मंत्रियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन राजा मुनियों के दर्शन के लिए पहुंचे। सभी मुनि ध्यान में लीन थे, इसलिए राजा से उनका कोई संवाद नहीं हुआ। मंत्रियों ने राजा को भड़काने का प्रयास किया, किंतु मुनियों के दर्शन मात्र से राजा के मन में श्रद्धा उत्पन्न हो गई।
वापसी के समय मंत्रियों ने श्रुतकीर्ति मुनि को आते देखा। उन्होंने मुनि का उपहास किया और अपशब्द कहे। मुनि ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। वाद-विवाद में चारों मंत्री पराजित हुए और अपमानित महसूस करने लगे। उनके मन में मुनि संघ के प्रति वैर उत्पन्न हो गया।
रात्रि में चारों मंत्री तलवार लेकर मुनि श्रुतकीर्ति की हत्या करने पहुंचे। जैसे ही उन्होंने तलवार उठाई, वनरक्षक देवता ने उन्हें मूर्ति के समान स्थिर कर दिया। वे मुनि को कोई क्षति नहीं पहुंचा सके।
प्रातः राजा को घटना की जानकारी हुई। वह अत्यंत क्रोधित हुए और मंत्रियों को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। लेकिन मुनि श्रुतकीर्ति ने राजा से उन्हें क्षमा करने का अनुरोध किया। राजा ने मुनि के आग्रह को स्वीकार करते हुए उनका प्राणदंड तो टाल दिया, लेकिन उन्हें गधे पर बैठाकर, मुंह काला कर नगर में घुमाने और देश निकाला देने का दंड दिया।
उज्जैन से निष्कासित होकर ये चारों मंत्री हस्तिनापुर पहुंचे। उस समय हस्तिनापुर के राजा पद्मराय जैन धर्म के अनुयायी थे। उनके छोटे भाई विष्णु कुमार तपस्या कर मुनि बन चुके थे।
चारों मंत्रियों ने अपनी चतुराई से राजा पद्मराय का विश्वास जीत लिया और मंत्री बन गए। उन्होंने राजा के शत्रु सिंहबल को कपट से बंदी बना लिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने बलि को वरदान मांगने को कहा। बलि ने तत्काल वरदान न मांगकर भविष्य के लिए उसे सुरक्षित रख लिया।
कुछ समय बाद आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ मुनियों के साथ हस्तिनापुर पहुंचे। यह समाचार मिलते ही बलि भयभीत हो गया, क्योंकि उज्जैन में मुनियों के साथ किए गए अपने अपराध का भेद खुलने का डर था। उसने राजा को दिए गए वरदान की याद दिलाई और सात दिनों के लिए हस्तिनापुर का राज्य मांग लिया।
राजा बनते ही बलि ने मुनियों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। उसने मुनियों के चारों ओर कांटेदार लकड़ियां लगवाकर उनमें आग लगवा दी और उन्हें मारने के उद्देश्य से नरमेघ नामक यज्ञ आरंभ कराया। यज्ञ के धुएं और अग्नि से मुनियों को अत्यंत कष्ट होने लगा।
उधर मिथिलापुर के वन में आचार्य सारचंद तपस्या कर रहे थे। उन्होंने अपने अवधि ज्ञान से जाना कि हस्तिनापुर में मुनियों पर घोर उपसर्ग हो रहा है। उन्होंने मुनि पुष्पदंत को बताया कि धारिणी सुभूषण पर्वत पर मुनि विष्णु कुमार विराजमान हैं और उन्हें विक्रिया ऋद्धि प्राप्त है। इसके माध्यम से वे आवश्यकता के अनुसार अपने शरीर को छोटा-बड़ा कर सकते हैं।
मुनि पुष्पदंत वहां पहुंचे और मुनि विष्णु कुमार को पूरी घटना बताई। अपनी शक्ति की परीक्षा करने के लिए विष्णु कुमार ने अपनी भुजा फैलाई, जो अत्यंत दूर तक पहुंच गई। इसके बाद वे हस्तिनापुर पहुंचे।
उन्होंने राजा पद्मराय को पूरी स्थिति बताई। तत्पश्चात मुनि विष्णु कुमार ने विक्रिया ऋद्धि से अपना शरीर पांच अंगुल जितना छोटा किया और ब्राह्मण का रूप धारण करके राजा बलि के पास पहुंचे।
बलि ने ब्राह्मण रूपधारी मुनि से इच्छित दान मांगने को कहा। मुनि विष्णु कुमार ने केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि ने तीन पग भूमि देने का संकल्प कर लिया।
इसके बाद मुनि विष्णु कुमार ने अपना विराट रूप धारण किया। पहला पग सुमेरु पर्वत पर और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रखा। तीसरे पग के लिए भूमि शेष न रहने पर उन्होंने बलि से स्थान पूछा। बलि ने अपनी पीठ पर तीसरा पग रखने की अनुमति दी।
मुनिराज ने तीसरा पग बलि की पीठ पर रखा। बलि भयभीत हो गया। देवताओं और असुरों के आसन भी कांपने लगे। सभी ने मुनि से बलि को क्षमा करने और उसकी पीठ से पग हटाने का अनुरोध किया। मुनि ने सात सौ मुनियों की रक्षा की शर्त रखी। बलि ने यज्ञ समाप्त कर मुनियों से क्षमा मांगी और इंद्र ने वर्षा कर अग्नि शांत कर दी।
यज्ञ के धुएं से मुनियों की आंखों, नाक और मुंह पर गंभीर प्रभाव पड़ा था। श्रावकों ने उनकी सेवा की और जल से उनके नेत्र, नाक और मुंह को साफ किया। उपसर्ग समाप्त होने के बाद मुनियों के लिए ऐसा आहार तैयार किया गया जिसे वे आसानी से ग्रहण कर सकें। परंपरा में इसी प्रसंग से दूध-सवैया, सवैया, घेवर और फैनी जैसे व्यंजनों के रक्षाबंधन से जुड़े होने की मान्यता बताई जाती है।
कथा के अनुसार जब मुनियों पर आया उपसर्ग समाप्त हुआ तो मुनियों ने मुनि विष्णु कुमार को रक्षा-सूत्र के रूप में धागा बांधा। यह घटना सावन शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुई। सात सौ मुनियों की रक्षा होने के कारण इस दिन को रक्षा-सूत्र और रक्षाबंधन के पर्व के रूप में मनाने की परंपरा जुड़ी।
राजा पद्मराय चारों मंत्रियों को उनके अपराध के लिए दंडित करना चाहते थे, लेकिन आचार्य श्री ने उन्हें क्षमा करने का संदेश दिया। 'दया ही धर्म का मूल है'—इस भावना से प्रेरित होकर चारों मंत्रियों ने अपने किए पर पश्चाताप किया और जैन धर्म को स्वीकार कर लिया।
आज रक्षाबंधन का स्वरूप व्यापक हो चुका है। सीमा पर तैनात सैनिक भी एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बांधकर परस्पर रक्षा और राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेते हैं। देशभर की छात्राएं और नागरिक सैनिकों के लिए राखियां भेजकर उनका मनोबल बढ़ाते हैं।
इस प्रकार रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह का पर्व नहीं, बल्कि परस्पर रक्षा, करुणा, सामाजिक एकता और राष्ट्र की सुरक्षा के संकल्प का पर्व भी है। इसकी यही व्यापक भावना इसे भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण पर्वों में स्थान देती है।
डिस्क्लेमर
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत आलेख में वर्णित जैन धर्म से संबंधित प्रसंग एवं रक्षाबंधन की परंपरा से जुड़ी कथाएं लेखक द्वारा जैन धार्मिक मान्यताओं और परंपरागत स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत की गई हैं। सवैया, घेवर और फैनी जैसे व्यंजनों के रक्षाबंधन से संबंध तथा अन्य ऐतिहासिक/धार्मिक प्रसंगों को इसी परंपरागत मान्यता के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। यह आलेख किसी अन्य धार्मिक परंपरा की मान्यता का खंडन या विवाद उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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