कांग्रेस को कभी रास नहीं आया ‘वंदे मातरम्’: आचार्य संजय तिवारी
आचार्य संजय तिवारी ने कांग्रेस पर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया है। उन्होंने गीत के ऐतिहासिक संदर्भों, स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका और 1923 के काकीनाड़ा कांग्रेस अधिवेशन में विष्णु दिगंबर पलुस्कर से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। लेख में कांग्रेस की वर्तमान भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
कांग्रेस की वर्किंग कमेटी कुछ नया नहीं कर रही है। जन्म से अब तक कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। भारत और भारतीयता इसकी नस में नहीं है। ‘वंदे मातरम्’ भी इसे कभी रास नहीं आया। यह अलग बात है कि भारत की संसद में राष्ट्रगीत के रूप में निर्धारित ‘वंदे मातरम्’ को लेकर आज भी राजनीतिक विवाद दिखाई देता है। कांग्रेस नेतृत्व द्वारा इसके संपूर्ण रूप के गायन से दूरी बनाए जाने के निर्णय को देश देख रहा है।
तथ्यों को समझने के लिए इतिहास में झांकना जरूरी है, ताकि यह प्रमाणित हो सके कि भारत और भारतीयता के तत्व कांग्रेस के लिए कितने महत्वपूर्ण रहे हैं।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ। इसी उपन्यास से ‘वंदे मातरम्’ गीत सामने आया। आगे चलकर यह गीत राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ आंदोलन का प्रमुख गीत बना और इसने जनमानस में नई ऊर्जा का संचार किया। 1906 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में भी इसका गायन हुआ।
इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया। क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच यह देशभक्ति और बलिदान की प्रेरणा का प्रतीक बन गया। अंग्रेजी शासन ने भी इसकी लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए इसके प्रति कठोर रवैया अपनाया।
बाद के वर्षों में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक और सांप्रदायिक विवाद सामने आए। 1937 में कांग्रेस के भीतर इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई। गीत के कुछ अंशों में भारत को देवी के रूप में चित्रित किए जाने को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्तियां सामने आईं। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी समिति ने इसके शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए स्वीकार करने का रास्ता सुझाया।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1923 का काकीनाड़ा कांग्रेस अधिवेशन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस समय कांग्रेस के अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ के गायन की परंपरा थी। महान शास्त्रीय गायक और राष्ट्रवादी संगीतज्ञ विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने जब अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ गाना शुरू किया तो इसका विरोध किया गया। इस प्रसंग को भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास में पलुस्कर की दृढ़ता के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।
पलुस्कर जैसे राष्ट्रवादी कलाकारों ने संगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रीय जागरण का साधन बनाया। ‘वंदे मातरम्’ के प्रति उनका आग्रह इसी व्यापक राष्ट्रवादी भावना का हिस्सा था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ ने जिस प्रकार करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाई, उसे इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह गीत केवल शब्दों और सुरों का संयोजन नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे लोगों के लिए आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का उद्घोष था।
आज जब ‘वंदे मातरम्’ को लेकर फिर राजनीतिक बहस हो रही है, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस गीत के ऐतिहासिक योगदान को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए?
कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाते हुए यह कहना होगा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रश्न पर राजनीतिक दलों को अधिक संवेदनशील और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की उस विरासत का हिस्सा है, जिसने देशवासियों में स्वाधीनता की आकांक्षा को मजबूत किया।
भारत को अपने राष्ट्रीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों के प्रति सजग रहना होगा। राजनीतिक असहमति अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वालों की भावनाओं और विरासत का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।
वंदे मातरम्।
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