डॉ. आरएमडी पर भारी पड़ी सिक्स लेन वाली टिप्पणी? भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर होने के बाद बढ़ीं राजनीतिक अटकलें
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गोरखपुर के राज्यसभा सांसद एवं निवर्तमान राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल को स्थान नहीं मिलने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। सिक्स लेन फ्लाईओवर के उद्घाटन में आमंत्रित न किए जाने पर सोशल मीडिया के जरिए जताई गई नाराजगी और पूर्व में कुछ संवेदनशील मामलों पर उनकी मुखर टिप्पणियों को भी राजनीतिक विश्लेषक मौजूदा घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब सवाल यही है कि यह बदलाव डॉ. अग्रवाल के लिए राजनीतिक अवरोध साबित होगा या किसी बड़ी जिम्मेदारी की भूमिका तैयार करेगा?
राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल के अगले राजनीतिक कदम पर निगाहें—राज्यपाल या मंत्री पद की संभावना से लेकर हाशिये पर जाने तक की चर्चाएं तेज
(संक्षिप्त टिप्पणी : रत्नाकर सिंह)
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गोरखपुर के चार बार के पूर्व विधायक और वर्तमान राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल को स्थान नहीं मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। खासकर इसलिए कि वे निवर्तमान राष्ट्रीय महासचिव के रूप में संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। दूसरी ओर स्मृति ईरानी, राम माधव और हरीश द्विवेदी जैसे नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलना इस फैसले को और अधिक चर्चित बना रहा है।
डॉ. अग्रवाल की राजनीतिक यात्रा सामान्य नहीं रही है। पेशे से बाल रोग विशेषज्ञ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त डॉ. अग्रवाल ने अपने राजनीतिक जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से निकटता से लेकर गोरक्षनाथ पीठ के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र तक अपनी जगह बनाई। ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ के लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका के बाद उनकी पहचान पीठ के राजनीतिक परिदृश्य में मजबूत हुई।
बाद के दौर में योगी आदित्यनाथ के साथ उनकी राजनीतिक निकटता ने उन्हें गोरखपुर सदर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में मजबूत आधार दिया। वे निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव जीते और बाद में भाजपा के विधायक बने। लगातार चार बार विधानसभा पहुंचना उनकी राजनीतिक पकड़ का प्रमाण माना गया।
लेकिन राजनीति में समीकरण स्थायी नहीं होते। समय के साथ डॉ. अग्रवाल और योगी आदित्यनाथ के बीच राजनीतिक दूरी की चर्चाएं भी सामने आती रहीं। वर्ष 2017 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो राजनीतिक गलियारों में डॉ. अग्रवाल को महत्वपूर्ण मंत्री पद मिलने की चर्चाएं थीं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण बदल गए।
इसके बाद डॉ. अग्रवाल को विधानसभा का टिकट नहीं मिला और उन्हें राज्यसभा भेजा गया। साथ ही उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। उस समय यह माना गया कि राष्ट्रीय संगठन में उनकी भूमिका भविष्य में उनके लिए किसी बड़े राजनीतिक अवसर का आधार बन सकती है।
लेकिन गोरखपुर में सिक्स लेन फ्लाईओवर के उद्घाटन के दौरान पैदा हुआ विवाद एक अलग तरह की चर्चा का कारण बना। बताया जाता है कि फ्लाईओवर उनके आवास के सामने बना था, लेकिन उद्घाटन कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। इस पर डॉ. अग्रवाल ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। क्या यही टिप्पणी उनके लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ गई? यह फिलहाल राजनीतिक चर्चा का विषय है, प्रमाणित तथ्य नहीं।
इससे पहले भी एक हत्या के मामले को लेकर डॉ. अग्रवाल की कुछ मुखर टिप्पणियां चर्चा में रही थीं। उनके बयानों में गोरखनाथ मंदिर का उल्लेख भी राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग अर्थों में देखा गया। हालांकि इन घटनाओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उनके स्थान न मिलने का प्रत्यक्ष कारण मानना फिलहाल केवल राजनीतिक अनुमान होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल है—डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल का अगला राजनीतिक पड़ाव क्या होगा?
उनके समर्थकों का मानना है कि वे कुशाग्र बुद्धि वाले, स्पष्ट वक्ता और परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक रास्ता तलाशने वाले नेता हैं। इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर होने के साथ उनकी राजनीतिक यात्रा कमजोर पड़ गई है।
राजनीतिक चर्चाओं में एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि उन्हें भविष्य में किसी संवैधानिक पद, जैसे राज्यपाल, अथवा केंद्र सरकार में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। दूसरी ओर यह भी संभव है कि उन्हें फिलहाल संगठन की मुख्यधारा से दूर रखा जाए।
सच्चाई यह है कि इन संभावनाओं में से किसी की अभी पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को किसी अंतिम राजनीतिक निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल के सामने अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ है। यह पड़ाव उनके लिए नई ऊंचाई की भूमिका तैयार करता है या राजनीतिक हाशिये की ओर ले जाता है—इसका फैसला आने वाला समय करेगा।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि गोरखपुर की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले डॉ. अग्रवाल के अगले कदम पर भाजपा ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल की राजनीतिक निगाहें टिकी हैं।
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