समरांगणसूत्रधार में 11वीं सदी की यांत्रिकी का विस्तृत वर्णन, यंत्रों से लेकर जलशक्ति तक का ज्ञान

आचार्य संजय तिवारी ने समरांगणसूत्रधार के 31वें अध्याय ‘यन्त्रविधान’ के आधार पर प्राचीन भारतीय यांत्रिकी और तरल यांत्रिकी के ज्ञान को रेखांकित किया है। लेख में यांत्रिक दरबान, स्वचालित यंत्र, विभिन्न प्रकार की गतियों, यंत्रों के गुणों तथा जलधारा से शक्ति उत्पादन संबंधी वर्णनों को सामने रखा गया है। साथ ही ग्रंथ में वर्णित विमान संबंधी श्लोकों और 83 अध्यायों की विषय-वस्तु का उल्लेख किया गया है।

Sep 20, 2026 - 06:44
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समरांगणसूत्रधार में 11वीं सदी की यांत्रिकी का विस्तृत वर्णन, यंत्रों से लेकर जलशक्ति तक का ज्ञान

समरांगणसूत्रधार : यांत्रिकी और तरल यांत्रिकी के प्राचीन ज्ञान का महाग्रंथ- आचार्य संजय तिवारी 

आज पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और अत्याधुनिक मशीनों के विकास को लेकर चर्चा कर रही है। ऐसे समय में प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित यांत्रिकी और स्वचालित यंत्रों से संबंधित सामग्री भी शोध और विमर्श का विषय बन रही है। इसी संदर्भ में आचार्य संजय तिवारी ने राजा भोज द्वारा रचित ‘समरांगणसूत्रधार’ के 31वें अध्याय ‘यन्त्रविधान’ में वर्णित यांत्रिक ज्ञान की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

धार के राजा भोज (1000–1055 ई.) से संबद्ध यह ग्रंथ भारतीय वास्तुशास्त्र का एक विस्तृत ज्ञानकोश माना जाता है। इसमें नगर नियोजन, भवन निर्माण, मंदिर वास्तु, मूर्तिकला और यंत्रों सहित विभिन्न विषयों का विवेचन मिलता है। ग्रंथ के 31वें अध्याय में अनेक प्रकार के यंत्रों, उनकी गति, कार्यप्रणाली और उपयोग का उल्लेख मिलता है।

यंत्रों की कार्यप्रणाली का वर्णन

‘यन्त्रविधान’ में यंत्रों की अलग-अलग क्रियाओं और गतियों का उल्लेख किया गया है। इसमें किसी यंत्र के बार-बार एक ही क्रिया करने, किसी के निश्चित समय के बाद क्रियाशील होने तथा कुछ यंत्रों द्वारा ध्वनि उत्पन्न करने जैसी कार्यप्रणालियों का वर्णन मिलता है।

ग्रंथ में यंत्रों के गुणों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें यंत्रों के सुचारु संचालन, पुर्जों के उचित संयोजन, कम ऊर्जा में कार्य करने, कम शोर, स्थिरता, बिना रुकावट संचालन, उद्देश्य की पूर्ति, कार्य के बाद मूल स्थिति में लौटने और लंबे समय तक कार्य करने जैसे गुणों का उल्लेख है।

इस आधार पर आचार्य संजय तिवारी ने इन वर्णनों में स्वचालित मशीनों की अवधारणा की संभावित झलक की ओर संकेत किया है। हालांकि इन प्राचीन वर्णनों और आधुनिक रोबोटिक्स के बीच सीधी समानता स्थापित करने के लिए ऐतिहासिक तथा तकनीकी शोध की आवश्यकता बनी रहती है।

विभिन्न दिशाओं में गति का उल्लेख

‘समरांगणसूत्रधार’ में यंत्रों की गतियों के संदर्भ में तिर्यक, ऊपर, नीचे, पीछे, आगे और पार्श्व दिशा में गति का उल्लेख मिलता है। श्लोक में कहा गया है—

“तिर्यगूर्ध्वमध: पृष्ठे पुरत: पार्श्वयोरपि।

गमनं सरणं पात इति भेदा: क्रियोद्भवा:॥”

इन गतियों का उल्लेख यह दर्शाता है कि ग्रंथकारों ने यांत्रिक क्रियाओं को अलग-अलग दिशा और गति के आधार पर समझने का प्रयास किया था।

तरल यांत्रिकी और जल से शक्ति

ग्रंथ में जल के भार, प्रवाह, गति और ऊंचाई से संबंधित शक्ति के उपयोग का भी वर्णन मिलता है। ‘यन्त्रविधान’ अध्याय में जलधारा और उसके प्रभाव से संबंधित श्लोकों का उल्लेख करते हुए आचार्य तिवारी ने इसे जलशक्ति तथा हाइड्रोलिक यांत्रिकी की प्राचीन अवधारणाओं से जोड़कर प्रस्तुत किया है।

जल के संग्रह, उसके प्रवाह और पुनः उपयोग के माध्यम से बल को कार्य में लगाने की प्रक्रिया का भी उल्लेख मिलता है। आधुनिक हाइड्रोलिक प्रणालियों से इसकी तुलना करते समय तकनीकी संदर्भ और ऐतिहासिक प्रमाणों का अलग-अलग अध्ययन आवश्यक है, लेकिन ग्रंथ में जल की गतिशील शक्ति को समझने की अवधारणा उल्लेखनीय है।

विमान संबंधी श्लोक

‘यन्त्रविधान’ अध्याय में लकड़ी से बने उड़ने वाले यंत्र अथवा ‘विमान’ से संबंधित कुछ श्लोक भी उद्धृत किए गए हैं। इनमें लकड़ी के ढांचे, आंतरिक यंत्र, अग्नि तथा पारद आदि का उल्लेख मिलता है।

इन श्लोकों को आधुनिक विमान तकनीक के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्वीकार करने से पहले मूल संस्कृत पाठ, विभिन्न पांडुलिपियों, टीकाओं और उनके ऐतिहासिक संदर्भ का आलोचनात्मक अध्ययन जरूरी है। फिर भी ये वर्णन प्राचीन भारतीय साहित्य में यंत्र और उड़ान की कल्पनाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करते हैं।

83 अध्यायों में विस्तृत विषय-वस्तु

‘समरांगणसूत्रधार’ केवल यंत्रों तक सीमित ग्रंथ नहीं है। इसमें नगर-नियोजन, राजगृह, शाला निर्माण, द्वार, प्रासाद, मंदिर, मंडप, प्रतिमा, मूर्तिकला, वास्तु-दोष और अनेक स्थापत्य विषयों पर अलग-अलग अध्याय हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार ग्रंथ में कुल 83 अध्याय हैं और ‘यन्त्रविधान’ इसका 31वां अध्याय है।

इस प्रकार ‘समरांगणसूत्रधार’ प्राचीन भारतीय वास्तु एवं तकनीकी परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ के रूप में सामने आता है। इसके यांत्रिकी संबंधी वर्णनों का आधुनिक मशीन, रोबोटिक्स या हाइड्रोलिक तकनीक से संबंध स्थापित करने के लिए दावों के बजाय मूल ग्रंथ, अनुवाद, पुरातात्विक साक्ष्यों और आधुनिक तकनीकी विश्लेषण को साथ रखकर अध्ययन करना अधिक उपयोगी होगा।

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार