“न गुरूर, न लहजे में बनावट”, उनकी सादगी का ज़िक्र महफ़िल में बार-बार हुआ — शाश्वत तिवारी

शिक्षक से संगठनकर्ता, लखनऊ के महापौर से उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और फिर राज्यसभा तक पहुंचे डॉ. दिनेश शर्मा का सार्वजनिक जीवन केवल राजनीतिक पदों की यात्रा नहीं है। शिक्षा, संगठन, संवाद, अनुशासन और सहज व्यवहार उनकी सार्वजनिक पहचान के प्रमुख पहलू रहे हैं। बदलते राजनीतिक दौर में उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि राजनीति में पद से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का आचरण, निरंतरता और समाज के साथ संवाद होता है।

Sep 10, 2026 - 20:20
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“न गुरूर, न लहजे में बनावट”, उनकी सादगी का ज़िक्र महफ़िल में बार-बार हुआ — शाश्वत तिवारी

सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं, जिनके राजनीतिक विचारों से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत आचरण, सहजता और उपलब्धता को लेकर समाज में बहुत कम शिकायतें सुनाई देती हैं। डॉ. दिनेश शर्मा का सार्वजनिक जीवन इसी संदर्भ में देखने योग्य है।

राजनीति में पद मिलना बड़ी बात नहीं, बल्कि पद पर रहते हुए अपनी पहचान को पद से बड़ा बना लेना असली उपलब्धि है। एक शिक्षक, प्रोफेसर, संगठनकर्ता, लखनऊ के लंबे समय तक महापौर, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय वरिष्ठ नेता के रूप में डॉ. दिनेश शर्मा की यात्रा केवल पदों की सूची नहीं है। यह शिक्षा, संगठन, संवाद, अनुशासन और सहज व्यवहार के मेल की कहानी भी है।

डॉ. दिनेश शर्मा की राजनीतिक पहचान के पीछे उनका अकादमिक व्यक्तित्व हमेशा दिखाई देता है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़े रहे और वाणिज्य के प्रोफेसर के रूप में विद्यार्थियों के बीच अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 1988 में विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया और बाद में वाणिज्य विभाग में प्रोफेसर रहे।

शिक्षा और राजनीति की अपनी-अपनी कसौटियां हैं। शिक्षा व्यक्ति को तर्क करना सिखाती है, जबकि राजनीति उसे समाज को समझने का अवसर देती है। शिक्षक के सामने विद्यार्थी होता है और जनप्रतिनिधि के सामने पूरा समाज। डॉ. शर्मा के सार्वजनिक जीवन में इन दोनों भूमिकाओं का मेल दिखाई देता है।

उनकी राजनीतिक यात्रा विद्यार्थी परिषद से शुरू हुई और संगठन के विभिन्न दायित्वों से गुजरते हुए आगे बढ़ी। भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी के अन्य दायित्वों तक का सफर बताता है कि संगठन में स्थायी स्थान केवल बड़े पद से नहीं, बल्कि लगातार काम करने से बनता है।

लखनऊ जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील शहर की नगर राजनीति में लंबे समय तक नेतृत्व करना भी अपने आप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। नवाबी तहजीब, गंगा-जमुनी सामाजिक परंपरा, तेजी से बढ़ता महानगर, पुरानी बस्तियां, नई कॉलोनियां और बदलती नागरिक अपेक्षाएं—लखनऊ हमेशा से एक जटिल शहर रहा है।

डॉ. दिनेश शर्मा वर्ष 2006 में पहली बार लखनऊ के महापौर चुने गए और 2012 में दोबारा इस पद पर पहुंचे। वे 2006 से 2017 तक महापौर रहे। महापौर का पद सीधे तौर पर नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा होता है। सड़क, सफाई, प्रकाश, जल निकासी, नगर नियोजन और नागरिक सुविधाओं जैसी समस्याओं का सामना स्थानीय नेतृत्व को करना पड़ता है।

उनके व्यक्तित्व की चर्चा करते समय सहजता और सरल व्यवहार का उल्लेख भी सामने आता है। सार्वजनिक जीवन में सहज उपलब्धता आज की राजनीति में विशेष महत्व रखती है। राजनीति केवल भाषणों से नहीं चलती, बल्कि संवाद से चलती है। संवाद तभी संभव है जब नेता और कार्यकर्ता तथा आम नागरिक के बीच दूरी कम हो।

डॉ. शर्मा के व्यक्तित्व का एक प्रेरक पक्ष यह भी है कि राजनीति में आने के बाद उनके भीतर का शिक्षक समाप्त नहीं हुआ। एक शिक्षक का मूल स्वभाव समझाना, सुनना, प्रश्नों का उत्तर देना और नई पीढ़ी को तैयार करना होता है। राजनीति में भी यही गुण किसी नेता को केवल पदाधिकारी से आगे ले जाकर मार्गदर्शक की भूमिका में पहुंचा सकते हैं।

2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद डॉ. दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। उनके पास शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग भी रहे। एक शिक्षक के लिए शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मिलना निश्चित रूप से अलग महत्व रखता है।

लोकतंत्र में किसी भी राजनेता की आलोचना हो सकती है और यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत कटुता के बीच अंतर होना चाहिए। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत गरिमा, संवाद और शालीनता को बनाए रखना लोकतांत्रिक संस्कार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज जब राजनीतिक भाषा अधिक आक्रामक होती दिखाई देती है, तब संयमित और संवादपरक सार्वजनिक व्यवहार यह संदेश देता है कि दृढ़ता और विनम्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। व्यक्ति अपने विचारों पर दृढ़ रह सकता है और फिर भी सामने वाले का सम्मान कर सकता है।

किसी सार्वजनिक व्यक्ति को पूरी तरह “निर्विवाद” कहना सावधानी की मांग करता है। लंबे राजनीतिक जीवन में विचारों, बयानों और राजनीतिक निर्णयों पर बहस होना स्वाभाविक है। इसलिए डॉ. दिनेश शर्मा के सार्वजनिक जीवन को उनकी दीर्घ राजनीतिक यात्रा, संगठनात्मक भूमिका, प्रशासनिक अनुभव और व्यक्तिगत सरलता के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।

आज की युवा पीढ़ी के लिए उनकी यात्रा से कई संदेश निकाले जा सकते हैं—पद के पीछे भागने के बजाय काम पर ध्यान देना, शिक्षा को महत्व देना, संगठन में छोटे दायित्व को भी गंभीरता से निभाना, कार्यकर्ताओं और आम लोगों से संवाद बनाए रखना तथा विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति का सम्मान करना।

लखनऊ की राजनीति से राष्ट्रीय दायित्व तक

लखनऊ के महापौर से उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और फिर राज्यसभा तक की यात्रा डॉ. दिनेश शर्मा के राजनीतिक विस्तार को दर्शाती है। 2023 में वे राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए। लेकिन किसी भी राजनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल उसके पदों की संख्या नहीं होती।

आज राजनीति में तेज आवाज को अक्सर मजबूत नेतृत्व समझ लिया जाता है। सोशल मीडिया की आक्रामकता को जनसमर्थन का पैमाना मान लिया जाता है और पद को प्रतिष्ठा का पर्याय बना दिया जाता है। ऐसे समय में डॉ. दिनेश शर्मा का सार्वजनिक जीवन यह याद दिलाता है कि राजनीति की वास्तविक शक्ति संयम, संवाद और निरंतरता में भी होती है।

शिक्षक का धैर्य, संगठनकर्ता का अनुशासन, जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी और राजनेता की राजनीतिक समझ—इन चारों का संतुलन किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है।

डॉ. दिनेश शर्मा की कहानी केवल किसी एक राजनीतिक दल की राजनीति की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी प्रेरणा का विषय है जो सार्वजनिक जीवन में आना चाहते हैं। राजनीति में सफलता के कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन सम्मान का रास्ता आज भी ईमानदार प्रयास, निरंतर श्रम, अध्ययन, संवाद और विनम्रता से होकर गुजरता है।

पद आते हैं और चले जाते हैं। सरकारें आती हैं और बदलती हैं। संगठन में जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं। लेकिन व्यक्ति का व्यवहार लोगों की स्मृति में लंबे समय तक रहता है।

इसीलिए डॉ. दिनेश शर्मा के सार्वजनिक जीवन को केवल राजनीतिक पदों की सूची के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। उनकी यात्रा उस क्रम को भी दिखाती है जिसमें एक शिक्षक संगठनकर्ता बना, संगठनकर्ता जनप्रतिनिधि बना, जनप्रतिनिधि प्रदेश के नेतृत्व तक पहुंचा और फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाता रहा।

भारतीय राजनीति को केवल बड़े नेताओं की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे सार्वजनिक व्यक्तित्वों की भी जरूरत है जो नई पीढ़ी को यह समझा सकें कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी है।

लखनऊ की धरती ने उन्हें शिक्षक के रूप में देखा, महापौर के रूप में देखा, संगठनकर्ता के रूप में देखा और प्रदेश के नेतृत्व में भी देखा। आज उनकी सार्वजनिक यात्रा को पीछे मुड़कर देखने का सार्थक तरीका यही है कि उससे आने वाली पीढ़ी क्या सीखती है।

अगर कोई युवा नेता यह सीख ले कि राजनीति में आगे बढ़ने के लिए पहले अपने भीतर के इंसान, विद्यार्थी और कार्यकर्ता को जीवित रखना जरूरी है, तो डॉ. दिनेश शर्मा की लंबी सार्वजनिक यात्रा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही होगा।

— शाश्वत तिवारी

(लेखक, विश्लेषक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार