यूपी में केवल 7.6% महिलाओं के नाम कृषि भूमि, भूमिहीन महिला श्रमिकों की हालत पर RSS समर्थित शोध रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
यूपी में केवल 7.6% महिलाओं के नाम कृषि भूमि, भूमिहीन महिला श्रमिकों की हालत पर RSS समर्थित शोध रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
लखनऊ(हिन्द भास्कर):- उत्तर प्रदेश की करोड़ों भूमिहीन किसान महिलाओं का पसीना खेतों को हरा-भरा रखता है, लेकिन भूमि, मजदूरी और निर्णय-अधिकार में उनकी हिस्सेदारी आज भी नगण्य है। यह खुलासा शुक्रवार को विश्व संवाद केन्द्र, जियामऊ लखनऊ में सामाजिक समरसता मंच, अवध प्रान्त द्वारा आयोजित प्रेसवार्ता में जारी शोध-प्रतिवेदन में हुआ है।
यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है।
श्रम और अधिकारों की खाई - चौंकाने वाले आंकड़े
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में केवल 7.6% महिलाओं के नाम पर कृषि भूमि दर्ज है। राज्य की 85% महिला श्रमशक्ति खेतों में जुटी है, लेकिन अधिकांश के श्रम को आज भी 'अवैतनिक' माना जाता है। पिछले एक वर्ष में काम करने वाली महिलाओं में से 18% से कम को ही नकद मजदूरी मिल पाई है।
मध्य, पूर्वी और दक्षिणी यूपी के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में निर्धनता दर 73.4% से 89.8% तक है, जिसमें बुंदेलखंड और अनुसूचित जाति की महिलाएं सबसे बड़ी शिकार हैं। महिला साक्षरता 66% बनाम पुरुष 82% है और 50% महिलाएं एनीमिया से जूझ रही हैं। केवल 16% भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा है।
मुख्य मांगें
- SC एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो।
- मनरेगा में भूमिहीन महिला श्रमिकों को सालभर रोजगार में प्राथमिकता मिले।
- समान काम का समान वेतन और तत्काल नकद भुगतान अनिवार्य हो।
- 'खेत मजदूर कार्ड' के जरिए पहचान कर DBT दिया जाए।
प्रेसवार्ता में प्रान्त प्रमुख राजकिशोर, शोध सहयोगी अविशा रवि और प्रान्तीय टोली के सदस्य बृजनंदन राजू उपस्थित रहे।
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