भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार : पत्रकारिता के ‘कल्याण’ मार्ग के विश्वकर्मा

हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाईजी’ ने ‘कल्याण’ के संपादन के माध्यम से धार्मिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता को हिंदी पत्रकारिता की विशिष्ट धारा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1926 में शुरू हुई ‘कल्याण’ की 100 वर्ष की यात्रा हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव के साथ जुड़ रही है। भारतीय वाङ्मय, धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन को सरल भाषा में व्यापक पाठक समाज तक पहुंचाने वाले भाईजी ने पत्रकारिता को समाचार से आगे विचार, संस्कार और मूल्य-संचार का माध्यम बनाया।

Sep 16, 2026 - 21:15
Sep 16, 2026 - 21:30
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भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार : पत्रकारिता के ‘कल्याण’ मार्ग के विश्वकर्मा

आज 17 सितंबर को ‘भाईजी’ हनुमान प्रसाद पोद्दार की जन्मजयंती है। इस वर्ष ‘कल्याण’ पत्रिका के प्रकाशन के भी 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। वर्ष 1926 में ‘कल्याण’ का प्रकाशन शुरू हुआ था। यह संयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इसके ठीक 100 वर्ष पहले, वर्ष 1826 में हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ प्रकाशित हुआ था। इस दृष्टि से वर्ष 2026 हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों और ‘कल्याण’ के 100 वर्षों की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

हिंदी पत्रकारिता की इन दो शताब्दियों में उसे अनेक मूर्धन्य संपादक मिले, जिन्होंने पत्रकारिता को अपने-अपने ढंग से समृद्ध किया। किसी ने राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया, किसी ने सामाजिक सुधार को गति दी, किसी ने साहित्य को समृद्ध किया तो किसी ने पत्रकारिता को जनजागरण का माध्यम बनाया। इसी दीर्घ परंपरा में धार्मिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता को व्यापक पहचान देने वाले संपादक के रूप में हनुमान प्रसाद पोद्दार का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म 17 सितंबर 1892 को शिलांग में हुआ था। स्नेहपूर्वक ‘भाईजी’ के नाम से प्रसिद्ध पोद्दार बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे संपादक, लेखक, साहित्यकार, समाजसेवी और आध्यात्मिक साधक होने के साथ भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के गंभीर अध्येता भी थे। औपचारिक शिक्षा बहुत अधिक न होने के बावजूद उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी तथा भारतीय वाङ्मय का व्यापक ज्ञान अर्जित किया।

भाईजी का नाम सबसे अधिक ‘कल्याण’ के साथ जुड़ा हुआ है। ‘कल्याण’ के संपादन के माध्यम से उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक सामग्री को सामान्य हिंदी पाठक तक पहुंचाने की एक विशिष्ट परंपरा विकसित की। गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, संत साहित्य और भारतीय दर्शन जैसे विषयों पर केंद्रित सामग्री को सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत कर उन्होंने भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक ज्ञान को बड़ी संख्या में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनके लिए ‘कल्याण’ केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि समाज में नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार का माध्यम थी।

भाईजी की संपादकीय दृष्टि की बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने पत्रकारिता को केवल समाचार अथवा सूचना तक सीमित नहीं माना। उन्होंने इसे विचार, संस्कार और मूल्य-संचार का माध्यम बनाया। ‘कल्याण’ के माध्यम से वे भारतीय जीवन-दृष्टि, सदाचार, आत्मसंयम, भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक चिंतन जैसे विषयों को पाठकों के सामने रखते रहे। इस प्रकार उन्होंने धार्मिक पत्रकारिता को हिंदी पत्रकारिता की एक स्वतंत्र और प्रभावशाली धारा के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका योगदान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने भारतीय वाङ्मय की अनेक ऐसी सामग्री को आधुनिक मुद्रण माध्यम के जरिए व्यापक समाज तक पहुंचाया, जो मुख्यतः संस्कृत और पारंपरिक विद्वत् परंपरा तक सीमित थी। इससे धर्म और संस्कृति से संबंधित ज्ञान को घर-घर तक पहुंचाने में सहायता मिली। ‘कल्याण’ के विभिन्न विशेषांकों ने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को एकत्रित, संपादित और प्रकाशित करने की ऐसी परंपरा बनाई, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान बनी।

भाईजी केवल संपादकीय कक्ष तक सीमित रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनका जीवन और उनका लेखन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उन्होंने जिस नैतिकता, भक्ति और आध्यात्मिक जीवन की चर्चा अपने लेखन में की, उसे अपने जीवन में भी अपनाने का प्रयास किया। यही कारण है कि उन्हें केवल ‘कल्याण’ के संपादक के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे अपने समय के ऐसे गृहस्थ संत थे, जिन्होंने पत्रकारिता को अपने सामाजिक और आध्यात्मिक कर्म का माध्यम बनाया।

आज विश्वकर्मा जयंती भी है। भारतीय परंपरा में विश्वकर्मा निर्माण और सृजन के प्रतीक माने जाते हैं। इस दृष्टि से आज के दिन भाईजी को याद करते हुए यह कहा जा सकता है कि भारतीय पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में वे भी एक प्रकार के ‘विश्वकर्मा’ थे। उन्होंने ईंट-पत्थर का भवन नहीं बनाया, बल्कि विचारों, संस्कारों और सांस्कृतिक चेतना का एक ऐसा संसार निर्मित किया, जिसकी आधारभूमि भारतीय धर्म और अध्यात्म था। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक पत्रकारिता और मुद्रण की शक्ति से जोड़ा।

हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास में ‘कल्याण’ की 100 वर्ष की यात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि पत्रकारिता का प्रभाव केवल तत्कालीन घटनाओं के समाचार देने तक सीमित नहीं होता। वह समाज की स्मृति, विचार, मूल्य और सांस्कृतिक चेतना के निर्माण में भी भूमिका निभा सकती है। भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने इसी व्यापक भूमिका को अपने संपादकीय कर्म के माध्यम से सामने रखा।

भाईजी ने लगभग 45 वर्षों तक ‘कल्याण’ का संपादन किया और अपने पीछे एक ऐसी संपादकीय परंपरा छोड़ी, जिसका प्रभाव धार्मिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता में आज भी देखा जाता है। उनका जीवन यह भी बताता है कि संपादक का कार्य केवल प्रकाशित होने वाली सामग्री का चयन और संपादन करना नहीं, बल्कि एक वैचारिक दिशा का निर्माण करना भी हो सकता है।

आज उनकी जन्मजयंती पर उन्हें स्मरण करना हिंदी पत्रकारिता के उस महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करना है, जिसमें पत्रकारिता समाचार से आगे बढ़कर धर्म, संस्कृति, अध्यात्म और नैतिक मूल्यों के संरक्षण तथा प्रसार का माध्यम बनी। ‘कल्याण’ के शताब्दी वर्ष में भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का स्मरण इसलिए भी प्रासंगिक है कि उनकी पत्रकारिता हमें हिंदी पत्रकारिता के सांस्कृतिक आयाम को समझने का अवसर देती है। उन्होंने जिस ‘कल्याण’ मार्ग का निर्माण किया, स्वयं उसी मार्ग पर चलते रहे और अपने कर्म से उसे एक दीर्घजीवी पत्रकारिता-परंपरा में परिवर्तित कर दिया।

— डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी

पत्रकारिता विभाग, दी.द.उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से सम्बद्ध; ‘कल्याण’ पर विस्तृत शोध प्रबंध के लेखक

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार