प्राचीन भारत में सूर्य पूजा : प्रतीक से मानव रूप तक विकसित हुई उपासना की परंपरा

प्राचीन भारत में सूर्य पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और व्यापक रही है। वैदिक साहित्य से लेकर रामायण, महाभारत, गुप्तकालीन अभिलेखों तथा पुरातात्त्विक साक्ष्यों तक सूर्य उपासना के प्रमाण मिलते हैं। सूर्य की आराधना केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय कला और मूर्तिशिल्प में भी इसका विशिष्ट स्थान रहा है। सूर्य की प्रतिमाओं के निर्माण और उनके लक्षणों का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

Sep 20, 2026 - 17:05
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प्राचीन भारत में सूर्य पूजा : प्रतीक से मानव रूप तक विकसित हुई उपासना की परंपरा

प्राचीन भारत में सूर्य पूजा : प्रतीक से मानव रूप तक विकसित हुई उपासना की परंपरा

कुँवर शीलवर्धन प्रताप नारायण सिंह

एडवोकेट/पत्रकार एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, प्रेस क्लब-गोरखपुर

सूर्य भारतीय धार्मिक परंपरा में प्रमुख देवताओं में माने जाते हैं। प्राचीन भारत में सूर्य की उपासना का एक स्वतंत्र सौर सम्प्रदाय भी विकसित हुआ। सूर्य को आदित्य तथा ग्रहपति के रूप में भी पूजा जाता रहा है। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में सूर्य केवल प्रकाश और ऊर्जा के प्रतीक नहीं रहे, बल्कि उनकी उपासना से जुड़ी समृद्ध धार्मिक एवं कलात्मक परंपरा भी विकसित हुई।

वेदों में सूर्य तथा उनके विभिन्न रूपों का उल्लेख मिलता है। परवर्ती वैदिक काल में सूर्य पूजा की लोकप्रियता और बढ़ी। रामायण और महाभारत जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में भी सूर्य उपासना के संदर्भ प्राप्त होते हैं। आगे चलकर गुप्तकालीन संस्कृत अभिलेखों में भी सूर्य पूजा के प्रमाण दिखाई देते हैं।

भारत के विभिन्न राजवंशों में भी सूर्य उपासना की परंपरा देखने को मिलती है। अभिलेखीय एवं ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर बलभी के मैत्रक शासकों में महाराज धरपट्ट तथा थानेश्वर के वर्धन शासकों में राज्यवर्धन, प्रभाकरवर्धन और आदित्यवर्धन आदि के सूर्य उपासक होने के उल्लेख मिलते हैं।

सूर्य पूजा पर विदेशी प्रभाव

ईसा की आरंभिक सदियों से सूर्य पूजा तथा सूर्य प्रतिमाओं के स्वरूप में कुछ विदेशी प्रभाव भी दिखाई देने लगते हैं। भारतीय कला के विकासक्रम में सूर्य प्रतिमाओं के स्वरूप में समय के साथ परिवर्तन हुआ। सूर्य सम्प्रदाय के अनुयायी उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत में भी विद्यमान रहे।

साहित्यिक ग्रंथों के साथ-साथ पुरातात्त्विक सामग्री भी इस बात की पुष्टि करती है कि प्राचीन भारत में सूर्य पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी। मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला और अभिलेखों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।

सूर्य प्रतिमा निर्माण के शास्त्रीय विधान

सूर्य की प्रतिमा के स्वरूप और उसके निर्माण से संबंधित अनेक नियम प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलते हैं। विष्णुधर्मोत्तर पुराण, विश्वकर्मशिल्प, बृहत्संहिता, मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, अंशुमद्भेदागम और सुप्रभेदागम आदि ग्रंथों में सूर्य प्रतिमा के लक्षण तथा मूर्तिविधान से संबंधित विषयों का उल्लेख किया गया है।

इन ग्रंथों में प्रतिमा के निर्माण, स्वरूप और उससे जुड़े विभिन्न शिल्पगत तत्वों का विवेचन मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परंपरा में देव प्रतिमा निर्माण केवल कलात्मक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि उसके लिए विशिष्ट शास्त्रीय मानदंड भी निर्धारित थे।

प्रतीक से मानव रूप तक

भारतीय कला में सूर्य का अंकन मुख्यतः दो रूपों में देखने को मिलता है—प्रतीकात्मक और मानव रूप में।

सूर्य से संबंधित किसी विशिष्ट सम्प्रदाय के विकसित होने से पहले भारतीय कला में सूर्य का चित्रण विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से किया जाता था। भारतीय धार्मिक परंपरा में देवी-देवताओं की आराधना के प्रारंभिक चरण में प्रतीकों का विशेष महत्व रहा है। इसी परंपरा के अंतर्गत सूर्य की पूजा और उनका कलात्मक अंकन भी प्रारंभिक दौर में प्रतीकात्मक रूप में हुआ।

समय के साथ इन प्रतीकों ने मानवाकार प्रतिमाओं का रूप ग्रहण किया और सूर्य की विशिष्ट प्रतिमा-विधान परंपरा विकसित हुई। यही विकास भारतीय मूर्तिकला और धार्मिक कला के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार