'नट सम्राट ' में मंचित हुआ एक कलाकार का अवसान नहीं, संवेदनाओं का महा आख्यान

Nov 1, 2026 - 13:03
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तालियों के साम्राज्य से तन्हाई के वनवास तक...

‘नटसम्राट’ में मंचित हुआ एक कलाकार का अवसान नहीं, संवेदनाओं का महाआख्यान

गोरंगम के पहले दिन अखिलेंद्र मिश्रा के अभिनय ने कुरेदी रिश्तों की दरकती जमीन; रंगमंच से उठे सवाल देर तक दर्शकों के अंतर्मन में गूंजते रहे

गोरखपुर।

मंच पर रोशनी का एक वृत्त है। उसके भीतर एक उम्रदराज कलाकार खड़ा है। कभी इसी कलाकार के अभिनय पर सभागार तालियों से गूंज उठता था। उसके संवादों में जीवन की धड़कन थी, उसकी भाव-भंगिमाओं में चरित्रों का संसार और उसकी आवाज में रंगमंच का सम्मोहन। लेकिन आज उसके सामने न कोई दर्शक-दीर्घा है, न प्रशंसा का कोलाहल। आज वह अपने ही लोगों के बीच अपने होने का अर्थ तलाश रहा है। उसके पास अतीत की असंख्य स्मृतियां हैं, मगर वर्तमान में कोई ऐसा कंधा नहीं, जिस पर सिर रखकर वह कुछ पल विश्राम कर सके।

यह दृश्य किसी एक वृद्ध कलाकार की नियति नहीं, हमारे समय के पारिवारिक जीवन का एक असहज सच है। शनिवार की शाम योगीराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में ‘नटसम्राट’ के मंचन के साथ यही सच रंगमंच पर उतर आया। कथा आगे बढ़ती रही और सभागार में बैठे दर्शक धीरे-धीरे एक ऐसे भाव-संसार में प्रवेश करते गए, जहां अभिनय और यथार्थ के बीच की विभाजक रेखा धुंधली पड़ने लगती है।

गोरखपुर रंग महोत्सव के चौथे संस्करण ‘गोरंगम’ का यह पहला दिन था। पांच दिवसीय रंगोत्सव की शुरुआत मुंबई के एकरंग नाट्य समूह, ड्रामा टॉकीज की इस प्रस्तुति से हुई। अभियान थियेटर ग्रुप, गोरखपुर द्वारा भारतेन्दु नाट्य अकादमी के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव में प्रख्यात रंगकर्मी एवं फिल्म अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने गणपति राव वेलवलकर यानी अप्पा के चरित्र को जिस गहराई से जिया, उसने एक बार फिर सिद्ध किया कि समर्थ अभिनय शब्दों का उच्चारण भर नहीं, अनुभूतियों का पुनर्जन्म है।

अप्पा रंगमंच के प्रतिष्ठित कलाकार हैं। उनका जीवन मंच की रोशनी में बीता है। उन्होंने किरदारों को जिया, संवादों को स्वर दिया और अपने अभिनय से दर्शकों के भीतर भावनाओं के अनगिनत संसार रचे। लेकिन रंगमंच से अवकाश के बाद जीवन का दूसरा अंक आरंभ होता है। वे अपनी संपत्ति संतानों के नाम कर देते हैं। पत्नी उन्हें रोकती है। उसका अनुभव भविष्य की आशंकाओं को पहले ही पढ़ चुका है। वह कहती है कि भरी थाली भले ही बांट दो, लेकिन जिस चटाई पर बैठे हो, उसे कभी मत देना।

इस छोटे-से कथन में भारतीय पारिवारिक जीवन का एक बड़ा अनुभव छिपा है। संपत्ति का हस्तांतरण केवल कागजों पर अधिकार बदलना नहीं होता, कई बार उसके साथ वृद्ध माता-पिता की निर्णय क्षमता और आत्मनिर्भरता भी दूसरों के हाथों में चली जाती है। अप्पा पत्नी की आशंका को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपने बच्चों पर भरोसा है। शायद वे यह भूल जाते हैं कि जीवन भर अर्जित किया हुआ विश्वास भी कभी-कभी समय की कसौटी पर दरक जाता है।

बेटे, बहू और बेटी के घरों में रहने की उनकी कल्पना धीरे-धीरे एक त्रासद अनुभव में बदल जाती है। जिन संतानों के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं का परित्याग किया, उन्हीं के घरों में वे अनावश्यक उपस्थिति बन जाते हैं। घर में उनके लिए स्थान है, लेकिन मन में जगह नहीं। दीवारें हैं, छत है, भोजन है, मगर वह आत्मीयता नहीं, जिसके सहारे वृद्धावस्था अपनी लंबी दोपहरें काटती है।

यहां ‘नटसम्राट’ अपने कथानक की सीमा लांघकर सामाजिक दस्तावेज बन जाता है। आधुनिक जीवन की विडंबना देखिए कि परिवारों के भौतिक विस्तार के साथ भावनात्मक संसार कई बार संकुचित होता चला गया है। सुविधाओं से सुसज्जित घरों में संबंधों की ऊष्मा का अभाव किसी अदृश्य शीतलहर की तरह फैल रहा है। माता-पिता की उम्र बढ़ती है तो उनकी जरूरतें बदलती हैं, लेकिन क्या उनके प्रति हमारा उत्तरदायित्व भी उसी अनुपात में बदलता है? नाटक इस प्रश्न को किसी उपदेश की तरह नहीं रखता, बल्कि अप्पा के जीवन की दरारों से उसे स्वतः प्रस्फुटित होने देता है।

पत्नी का निधन अप्पा के जीवन में एक और रिक्तता पैदा करता है। जीवन का सहचर चला जाए तो केवल वर्तमान ही सूना नहीं होता, अतीत का साझीदार भी छूट जाता है। स्मृतियों का विशाल संसार अचानक एकाकी हो उठता है। अप्पा के साथ भी यही होता है। विश्वास टूटता है, आत्मसम्मान आहत होता है और रिश्तों की परिचित दुनिया अपरिचित लगने लगती है।

तभी जीवन की इस उदास कथा में एक अप्रत्याशित पात्र प्रवेश करता है—एक मोची। न कोई रक्त-संबंध, न पारिवारिक विरासत, न संपत्ति का स्वार्थ। फिर भी वह अप्पा को अपने बाबा के रूप में स्वीकार करता है। जिस कलाकार को अपने ही परिवार में आश्रय नहीं मिला, उसे एक अपरिचित व्यक्ति के स्नेह में जीवन का संबल मिल जाता है। अप्पा भी उसे बेटे जैसा प्रेम देते हैं। अंततः इसी मुंहबोले बेटे के साथ रहते हुए उनकी जीवनयात्रा समाप्त होती है।

इस प्रसंग में नाटक का सबसे गहरा मानवीय सत्य निहित है। रिश्तों की वास्तविक पहचान वंशावली से नहीं, संवेदना से होती है। रक्त का संबंध जन्म दे सकता है, लेकिन अपनत्व का संबंध मनुष्यता के संस्कार से जन्म लेता है। एक ओर वे संतानें हैं जिनके लिए अप्पा ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, दूसरी ओर एक अपरिचित व्यक्ति है, जो बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के उनका हाथ थाम लेता है। यही विरोधाभास नाटक को करुणा की उस ऊंचाई तक पहुंचाता है, जहां दर्शक अपने समय और समाज से सवाल करने लगते हैं।

नाटक के संवाद इस संवेदना को और धार देते हैं। ‘दुनिया का हर सच, सच ही नहीं होता’, ‘टेलीग्राम तो घर तक जाता है, जरूरी नहीं कि दिल तक भी पहुंचे’ और ‘बच्चे बोर्डिंग स्कूल में हैं यानी घर नहीं, दीवारें ही दीवारें हैं’—इन संवादों में जीवन के अनुभवों का गाढ़ा अर्क है। इनमें व्यंग्य है, पीड़ा है और संबंधों की खोखली होती संरचना पर एक मार्मिक टिप्पणी भी। शब्द मंच से निकलते हैं, लेकिन उनका अर्थ दर्शकों के भीतर जाकर खुलता है।

अखिलेंद्र मिश्रा ने अप्पा के चरित्र को केवल अभिनय की तकनीक से नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक टूटन को आत्मसात करके प्रस्तुत किया। उनके चेहरे पर उभरते भाव, संवादों का उतार-चढ़ाव, देहभाषा और मौन के क्षण चरित्र को बहुआयामी बनाते हैं। कहीं अतीत के वैभव का स्वाभिमान है, कहीं उपेक्षित वृद्ध की विवशता और कहीं एक कलाकार का वह आहत अहं, जो अपनी पहचान के अंतिम अवशेषों को बचाए रखना चाहता है। उनके अभिनय में पात्र की पीड़ा और अभिनेता का कौशल एक-दूसरे में इस तरह घुलते हैं कि अप्पा मंच का चरित्र न रहकर एक जीवंत मनुष्य प्रतीत होने लगते हैं।

वी. वी. शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ की मूल मराठी रचना पर आधारित इस नाटक का हिंदी रूपांतरण सच्चिदानंद जोशी ने किया है। जयंत देशमुख की परिकल्पना एवं निर्देशन ने कथ्य को प्रभावशाली नाट्य संरचना प्रदान की। सरकार की भूमिका में शमीम अली और नंदू के रूप में अमितेश शर्मा ने अपनी छाप छोड़ी। शारदा के किरदार में आंशी मालवीय और गीतिका श्याम तथा नलू की भूमिका में बेला बारोट का अभिनय प्रभावी रहा। जिमी सलगोत्रा ने सुधाकर और दर्शक-2, जबकि विकास चौधरी ने महादेव और राजा की दोहरी भूमिकाएं निभाईं। अनिल अंजुनिल, अदिति शर्मा और स्वाति सिंह ने भी अपनी भूमिकाओं से प्रस्तुति को समृद्ध किया।

नाटक की सर्जनात्मक प्रक्रिया में सह-निर्देशक अनिल दुबे और सहायक निर्देशक स्वाति सिंह का योगदान रहा। उमेश तरकसवार के संगीत निर्देशन तथा वीणा तरकसवार और अभिलेखन मिश्रा के गायन ने प्रस्तुति के भावपक्ष को विस्तार दिया। राजीव मिश्रा इसके निर्माता थे।

और फिर एक समय ऐसा आता है जब मंच पर अप्पा की जीवनयात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती है। एक कलाकार, जिसने जीवन भर दूसरों के लिए संवाद बोले, स्वयं एक ऐसे मौन में विलीन हो जाता है, जहां शब्द भी असहाय हो जाते हैं। नाटक का अंत हो जाता है, लेकिन उसके भीतर उठे प्रश्नों का कोई पटाक्षेप नहीं होता।

सभागार से बाहर निकलते हुए शायद हर दर्शक अपने भीतर एक अप्पा को तलाश रहा था। किसी को अपने पिता की याद आई होगी, किसी को अपने घर का कोई वृद्ध चेहरा और किसी को शायद अपने ही भविष्य की एक धुंधली आकृति दिखाई दी होगी।

रंगमंच की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह हमें कुछ देर के लिए दूसरे का जीवन जीने का अवसर देता है और फिर लौटते समय अपने ही जीवन से हमारा सामना करा देता है। ‘नटसम्राट’ ने भी यही किया। उसने तालियों के बीच एक कलाकार की प्रतिष्ठा दिखाई और खामोशी के बीच उसके अकेलेपन का विस्तार।

पर्दा गिर चुका था। मंच की रोशनियां बुझ चुकी थीं। कलाकार अपने-अपने किरदारों से बाहर आ चुके थे। लेकिन अप्पा अब भी मन के किसी कोने में बैठे थे—शायद किसी दरवाजे के खुलने की प्रतीक्षा में।

कितनी विचित्र विडंबना है कि जिसने जीवन भर रंगमंच को अपना घर बनाया, उसे जीवन के अंतिम अंक में घर की तलाश करनी पड़ी।

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार