महर्षि वाल्मीकि के अंतर्मन में जागी करुणा की दिव्य चेतना
महर्षि वाल्मीकि के अंतर्मन में जागी करुणा की दिव्य चेतना
लेखक- कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार ,वरिष्ठ उपाध्यक्ष ,गोरखपुर प्रेस क्लब
भारतीय वाङ्मय के विस्तीर्ण आकाश में महर्षि वाल्मीकि का व्यक्तित्व उस ध्रुवतारे के समान देदीप्यमान है, जिसकी आभा युगों की सीमाओं का अतिक्रमण कर मानवता को आलोकित करती रही है। वे केवल संस्कृत के आदिकवि और रामायण के रचयिता नहीं, अपितु करुणा, आत्मपरिष्कार और मानवीय संवेदना की उस सनातन चेतना के संवाहक हैं, जिसने साहित्य को लोकमंगल का माध्यम बनाया। उनके जीवन से जुड़ा क्रौंच-वध का मार्मिक प्रसंग इस सत्य का उद्घाटन करता है कि जब संवेदना अंतःकरण की गहराइयों में स्पंदित होती है, तब वह केवल भावुकता बनकर नहीं रह जाती, बल्कि सृजन की ऐसी शक्ति में परिणत होती है, जो समूचे युग की चेतना को दिशा देने में समर्थ होती है।
भारतीय परंपरा में वर्णित आख्यान के अनुसार, एक दिन महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्य भारद्वाज के साथ तमसा नदी के तट की ओर जा रहे थे। प्रकृति की नीरवता, वनप्रदेश की रमणीयता और निर्मल जलधारा का सौंदर्य उनके अंतर्मन को सहज ही आलोकित कर रहा था। तभी उनकी दृष्टि वृक्ष की शाखा पर प्रेममग्न क्रौंच पक्षियों के जोड़े पर पड़ी। उसी क्षण एक निषाद के बाण ने नर पक्षी का प्राणांत कर दिया। अपने सहचर के वियोग में मादा क्रौंची का करुण विलाप वन की निस्तब्धता को विदीर्ण करने लगा। यह दृश्य महर्षि के संवेदनशील हृदय को भीतर तक उद्वेलित कर गया। एक निरीह प्राणी की असहाय पीड़ा ने उनके अंतर्मन में ऐसी वेदना जगाई, जिसने संस्कृत काव्य की परंपरा में एक विलक्षण अध्याय का सूत्रपात किया।
उस करुण क्षण में महर्षि के मुख से जो वाणी प्रस्फुटित हुई, वह भारतीय साहित्यिक परंपरा में प्रथम श्लोक के रूप में प्रतिष्ठित हुई—
“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥”
यह श्लोक केवल एक पक्षी की मृत्यु पर व्यक्त आक्रोश नहीं था; यह प्राणिमात्र के प्रति करुणा, प्रेम और सह-अस्तित्व की प्रतिष्ठा का उद्घोष भी था। परंपरागत आख्यान में महर्षि के शोक से श्लोक का उद्भव साहित्य-सृजन की उस विलक्षण प्रक्रिया का प्रतीक बन जाता है, जिसमें व्यक्तिगत अनुभूति सार्वजनीन संवेदना का रूप धारण कर लेती है। यहां करुणा काव्य की जननी है और वेदना सृजन का उद्गम। यही वह बिंदु है, जहां मनुष्य का अंतर्मन प्रकृति के समस्त प्राणियों के साथ अपनी आत्मीय एकात्मता का अनुभव करता है।
महर्षि वाल्मीकि की महत्ता इस तथ्य में भी निहित है कि उन्होंने करुणा को केवल क्षणिक भावोद्रेक तक सीमित नहीं रहने दिया। रामायण की रचना के माध्यम से उन्होंने उसे जीवन-मूल्यों, धर्मबोध और लोककल्याण की व्यापक भूमि प्रदान की। भगवान श्रीराम का चरित्र मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की प्रतिष्ठा करता है; माता सीता का जीवन धैर्य, आत्मसम्मान और आंतरिक दृढ़ता की गरिमा प्रकट करता है; भरत का भ्रातृप्रेम सत्ता के मोह पर नैतिकता की विजय का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इन चरित्रों के माध्यम से रामायण मनुष्य को यह समझाती है कि जीवन की वास्तविक महानता अधिकारों के उपभोग में नहीं, बल्कि कर्तव्यों के निर्वहन और मानवीय मर्यादाओं के संरक्षण में निहित है।
वाल्मीकि की काव्यदृष्टि का वैशिष्ट्य यह है कि वह मनुष्य को उसके संघर्षों, दुर्बलताओं, संबंधों और नैतिक द्वंद्वों सहित देखती है। उनके महाकाव्य में वन केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षा की भूमि भी है; वनवास केवल राजकीय परिस्थिति नहीं, बल्कि त्याग और धैर्य की कसौटी है। रामायण का संसार हमें यह बोध कराता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल अनुष्ठानों और रूढ़ियों में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण आचरण, उत्तरदायित्व और लोकहित की भावना में प्रकट होता है। इसीलिए महर्षि की साहित्यिक विरासत किसी एक कालखंड या समुदाय की धरोहर नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए नैतिक और सांस्कृतिक प्रेरणा का अक्षय स्रोत है।
महर्षि वाल्मीकि के जीवन से संबद्ध रत्नाकर के रूपांतरण की प्रचलित कथा भी आत्मजागरण की इसी संभावना को रेखांकित करती है। इस आख्यान का केंद्रीय संदेश यह है कि मनुष्य अपने अतीत की सीमाओं में सदैव के लिए आबद्ध नहीं होता। आत्मबोध, साधना और संकल्प के माध्यम से उसके जीवन की दिशा परिवर्तित हो सकती है। किसी व्यक्ति के वर्तमान का मूल्यांकन करते समय उसके अतीत को ही अंतिम सत्य मान लेना मानवीय परिवर्तन की संभावनाओं को नकारना है। वाल्मीकि की परंपरा हमें स्मरण कराती है कि मनुष्य के भीतर सुप्त सद्गुणों को जागृत करने के लिए उपेक्षा और तिरस्कार से अधिक आवश्यक है विवेक, अवसर और आत्मपरिष्कार की प्रेरणा।
आज जब समाज अनेक प्रकार की विसंगतियों, वैचारिक कटुता, हिंसा और संवेदनहीनता से जूझ रहा है, तब महर्षि वाल्मीकि की करुणा-चेतना का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। तकनीकी प्रगति ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएं प्रदान की हैं, किंतु सुविधा की प्रचुरता अपने आप संवेदनशीलता की गारंटी नहीं बन सकती। संवाद के साधन बढ़े हैं, परंतु आत्मीय संवाद के अवसर अनेक बार घटे हैं। प्रतिस्पर्धा ने उपलब्धियों की आकांक्षा को तीव्र किया है, किंतु दूसरों की पीड़ा को समझने का अवकाश संकुचित किया है। ऐसे समय में क्रौंची का विलाप हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हमारे भीतर किसी अन्य प्राणी, किसी असहाय मनुष्य अथवा किसी पीड़ित परिवार की वेदना से विचलित होने की संवेदना शेष है?
करुणा दुर्बलता नहीं, बल्कि विकसित मनुष्यता का सर्वोच्च गुण है। वह अन्याय के प्रति मौन स्वीकृति नहीं, बल्कि पीड़ित के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस है। वह केवल आंसू बहाने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि पीड़ा के निवारण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा है। महर्षि वाल्मीकि के आदर्श को आत्मसात करने का अर्थ है कि साहित्य को समाज की वेदना से जोड़ा जाए, शिक्षा को चरित्र-निर्माण का माध्यम बनाया जाए और संस्कृति को मानवीय गरिमा के संरक्षण का आधार माना जाए। जब समाज का समर्थ वर्ग निर्बल के प्रति संवेदनशील होता है, जब ज्ञान अहंकार के स्थान पर विनम्रता जगाता है और जब शक्ति लोककल्याण के लिए प्रयुक्त होती है, तभी सभ्यता अपनी वास्तविक ऊंचाई प्राप्त करती है।
महर्षि वाल्मीकि की जयंती केवल एक महान ऋषि और कवि का स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन में करुणा की सुप्त ज्योति को प्रज्वलित करने का संकल्प भी है। क्रौंच-वध के उस मार्मिक प्रसंग से आरंभ हुई काव्य-चेतना आज भी हमें यह संदेश देती है कि संसार को अधिक सुंदर बनाने के लिए संवेदनशील हृदय, विवेकपूर्ण दृष्टि और उत्तरदायी आचरण की आवश्यकता है। जिस दिन दूसरे के दुख में हमें अपनी मनुष्यता की पुकार सुनाई देने लगेगी, उसी दिन साहित्य का लोकमंगलकारी उद्देश्य और संस्कृति का मानवीय आदर्श अधिक सार्थक हो उठेगा। यही महर्षि वाल्मीकि की करुणा की दिव्य चेतना का शाश्वत आलोक है, जो युगों-युगों तक मानवता का पथ प्रशस्त करता रहेगा।
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