शरद पूर्णिमा: चांदनी के बहाने संवेदना और संतुलन की तलाश
भारतीय संस्कृति में शरद पूर्णिमा केवल चंद्रदर्शन का पर्व नहीं, बल्कि संवेदना, संतुलन और आत्मावलोकन का सांस्कृतिक संदेश है। कोजागरी की लोकमान्यता, महारास की आध्यात्मिक परम्परा और खीर की आत्मीय स्मृति से जुड़ा यह पर्व आधुनिक भागदौड़ में ठहरने और संबंधों की ऊष्मा को बचाए रखने की प्रेरणा देता है।
शरद पूर्णिमा: चांदनी के बहाने जीवन में संवेदना और संतुलन की तलाश
कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह,
वरिष्ठ उपाध्यक्ष, गोरखपुर प्रेस क्लब
भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल सौंदर्य की सृष्टा नहीं, अपितु जीवन-दर्शन की मौन व्याख्याता भी है। उसकी प्रत्येक ऋतु मनुष्य के अंतर्मन से संवाद करती है। इन्हीं ऋतु-संवेदनाओं के मध्य शरद पूर्णिमा ऐसी अनुपम वेला है, जब पूर्णचंद्र अपनी धवल चांदनी से धरा को अभिसिंचित करता है।
भारतीय लोकजीवन में इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। ‘को जागर्ति’ अर्थात कौन जाग रहा है। इस लोकमान्यता में मां लक्ष्मी के आगमन का भाव है, पर इसका व्यापक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने विवेक और कर्तव्य के प्रति जागरूक रहे। वास्तविक समृद्धि स्वर्ण संचय में नहीं, संतोष, सदाचार और करुणा से संपन्न जीवन में है।
शरद पूर्णिमा का संबंध श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी है। भारतीय भक्तिधारा में रास केवल नृत्य नहीं, जीवात्मा और परमात्मा के अनन्य अनुराग की अभिव्यक्ति है। सूरदास की भक्ति और रसखान का अनुराग यही सिखाते हैं कि प्रेम अधिकार जताने में नहीं, दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देने में निहित है।
इस पर्व पर खीर को चांदनी में रखने की परम्परा भारतीय घर-आंगन की आत्मीय स्मृति है। लोकविश्वास में इसे अमृततुल्य माना जाता है। इसकी सांस्कृतिक महत्ता निर्विवाद है - परिवार का एकत्र होना, प्रसाद वितरण और बड़ों का स्नेह पर्व को आत्मीय उत्सव बना देता है। परम्पराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों के साथ अगली पीढ़ी तक पहुंचें।
वर्तमान समय में भौतिक प्रगति के साथ अंतर्मन की शांति चुनौतीपूर्ण हुई है। संचार के साधनों ने दूरियां घटाई हैं, पर निकट बैठे लोगों के बीच भी संवादहीनता बढ़ी है। ऐसे समय में शरद पूर्णिमा की चांदनी ठहरने और अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार की प्रेरणा देती है।
चंद्रमा की महिमा उसके शीतल प्रकाश में है। वह प्रखर ताप से नहीं, सौम्य आभा से रात्रि को सुंदर बनाता है। मनुष्य के व्यक्तित्व में भी प्रतिभा के साथ विनम्रता और करुणा आवश्यक है। यदि ज्ञान अहंकार को पोषित करे और सफलता दूसरों की पीड़ा से विमुख कर दे, तो वह अपने नैतिक अर्थ खो देती है।
शरद पूर्णिमा का सामाजिक संदेश भी महत्वपूर्ण है। चांदनी बिना भेदभाव के सब पर बिखरती है, वैसे ही मनुष्यता का प्रकाश भी जाति, वर्ग और विषमता से परे सम्मान का भाव विकसित करे। उत्सवों का आलोक उन घरों तक भी पहुंचे, जहां अभाव और अकेलापन है।
अंततः यह पर्व स्मरण कराता है कि जीवन की पूर्णता बाहरी वैभव से अधिक अंतर्मन की निर्मलता में है। जैसे मेघ छंटने पर चंद्रमा निखरता है, वैसे ही अहंकार और द्वेष हटने पर मनुष्य का वास्तविक स्वरूप प्रकाशित होता है। संवेदना से संपन्न हृदय, संतुलित विचार और सद्भावपूर्ण आचरण ही जीवन की वास्तविक पूर्णिमा हैं।
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