काशी में 3 से 5 नवंबर तक होगी संस्कृति संसद
तीन दिनों तक संतों, विद्वानों, वैज्ञानिकों, कलाकारों और युवाओं का होगा महासंगम; Gen Z Conclave और संस्कृति उत्सव होंगे विशेष आकर्षण
3000 संत और 7000 से अधिक युवा होंगे शामिल
भारतीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक पहचान पर होगा मंथन
देश-विदेश के विद्वान भी होंगे शामिल
विशेष संवाददाता
वाराणसी। धार्मिक और आध्यात्मिक नगरी काशी में भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रीय चेतना के व्यापक विमर्श के लिए तीन दिवसीय संस्कृति संसद का आयोजन किया जाएगा। तीन, चार और पांच नवंबर 2026 को आयोजित होने वाली इस संस्कृति संसद में देशभर से करीब 3000 संत, 7000 से अधिक राष्ट्रनिष्ठ युवा और विश्वभर से भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा रखने वाले विद्वान शामिल होंगे। इसमें भारतीय संस्कृति की मूल भावना को संरक्षित रखने, नई पीढ़ी तक अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को पहुंचाने तथा वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत बनाने पर विचार-विमर्श होगा।
रविवार को सिगरा स्थित सत कैवल्य ज्ञान पीठ (गुजराती धर्मशाला) में आयोजित पत्रकारवार्ता में अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि भारत की धार्मिक राजधानी काशी में आयोजित होने वाली संस्कृति संसद में संतों, कलाकारों, विद्वानों और युवाओं का संगम होगा। यह आयोजन भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों पर सामूहिक चिंतन का अवसर प्रदान करेगा। इसमें संस्कृति के संरक्षण के साथ ही उसे वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप आगे बढ़ाने की दिशा में भी चर्चा होगी।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 से प्रत्येक दो वर्ष पर आयोजित हो रही संस्कृति संसद अब सामूहिक विमर्श का विराट मंच बन चुकी है। पिछले आयोजनों ने यह साबित किया है कि जब संत, विद्वान, कलाकार और युवा एक मंच पर बैठकर विचार साझा करते हैं तो भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की संभावनाएं और मजबूत होती हैं। संस्कृति संसद का उद्देश्य केवल विचारों का आदान-प्रदान करना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से देश को दिशा देने वाली सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है।
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदगुरु अविचल देवाचार्यजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। इसमें परिवार, समाज, प्रकृति, मानवता और समस्त जीवों के प्रति संवेदनशीलता का भाव समाहित है। भारत की सांस्कृतिक विरासत ने सदियों से दुनिया को सहअस्तित्व, समरसता और वसुधैव कुटुंबकम का संदेश दिया है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों और परंपराओं को पहचाने। संस्कृति संसद के माध्यम से संत समाज इस दिशा में युवाओं को जागरूक करने और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत बनाने का प्रयास करेगा।
राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी निरंतरता और समावेशी दृष्टिकोण है। समय बदलता रहा, परिस्थितियां बदलती रहीं, लेकिन भारतीय संस्कृति ने अपने मूल मूल्यों को सुरक्षित रखा। आज वैश्वीकरण के दौर में हमारी सांस्कृतिक पहचान को समझना और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। संस्कृति संसद में संतों, विद्वानों और युवाओं के बीच होने वाला संवाद इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाएगा। भारत की सांस्कृतिक शक्ति को पहचानकर ही विकसित और प्रतिष्ठित भारत की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।
संयुक्त मंत्री महामंडलेश्वर मनमोहन दास राधे-रोधे बाबा ने कहा कि भारतीय संस्कृति का आधार आध्यात्मिकता, सेवा, त्याग, करुणा और सामाजिक समरसता है। संत परंपरा ने हमेशा समाज को सही दिशा देने और मानवीय मूल्यों को जीवित रखने का कार्य किया है। वर्तमान समय में युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण है। संस्कृति संसद ऐसा मंच बनेगी, जहां परंपरा और आधुनिकता के बीच सकारात्मक संवाद स्थापित होगा। यहां से निकलने वाले विचार और संकल्प भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने में सहायक होंगे।
उन्होंने बताया कि संस्कृति संसद में होने वाले संवाद और विचार-विमर्श का उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत को केवल अतीत की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उसे भविष्य की शक्ति बनाना है। प्रत्येक विचार, संवाद और संकल्प में विकसित एवं प्रतिष्ठित भारत की परिकल्पना निहित है। काशी की धरती से उठने वाली सांस्कृतिक चेतना देश और दुनिया में भारतीय परंपराओं के प्रति नई समझ विकसित करेगी।
छह प्रमुख आयामों में आयोजित होंगे कार्यक्रम
संस्कृति संसद 2026 का आयोजन केवल एक वैचारिक सम्मेलन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को समाहित करने वाले एक व्यापक सांस्कृतिक महाकुंभ के रूप में किया जा रहा है। इसके अंतर्गत छह प्रमुख कार्यक्रम आयोजित होंगे। इनमें मुख्य संस्कृति संसद, Gen Z Conclave, प्रतिदिन सायंकालीन संस्कृति उत्सव, राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रदर्शनी तथा रंगोली और बाल चित्रकला प्रतियोगिताएं प्रमुख हैं।
मुख्य सभागार में तीन दिनों तक होगा संस्कृति संसद का विमर्श
रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं कन्वेंशन सेंटर के मुख्य सभागार में प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक संस्कृति संसद के मुख्य सत्र आयोजित होंगे। इसमें देशभर के संत, धर्माचार्य, विद्वान, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, विषय विशेषज्ञ और विभिन्न क्षेत्रों के चिंतक भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक चुनौतियों और भविष्य की दिशा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखेंगे। इन सत्रों का उद्देश्य परंपरा और समकालीन चुनौतियों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है।
Gen Z Conclave में युवा पीढ़ी रखेगी अपनी बात
संस्कृति संसद का एक विशेष आकर्षण Gen Z Conclave होगा, जिसका आयोजन प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक अलग सेमिनार हॉल में किया जाएगा। इसमें देशभर से आए युवाओं को अपनी बात रखने, प्रश्न पूछने और भारतीय संस्कृति से जुड़े समकालीन विषयों पर संवाद करने का अवसर मिलेगा। इस कॉन्क्लेव में लगभग 90 प्रतिशत वक्ता युवा पीढ़ी से होंगे, जबकि 10 प्रतिशत विशेषज्ञ एवं अनुभवी मार्गदर्शक होंगे। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय विचारधारा से जोड़ना तथा युवाओं को सांस्कृतिक विमर्श का सक्रिय भागीदार बनाना है।
प्रतिदिन शाम को होगा संस्कृति उत्सव
तीनों दिन शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक मुख्य सभागार में संस्कृति उत्सव का आयोजन किया जाएगा। इसमें देश की विविध लोक एवं शास्त्रीय कलाओं, संगीत, नृत्य, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पारंपरिक कला रूपों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन होगा। इस कार्यक्रम में विशेष रूप से युवा दर्शकों और कलाकारों की सहभागिता रहेगी।
चित्रकला और फोटोग्राफी प्रदर्शनी में दिखेगी भारतीय विरासत की झलक
संस्कृति संसद के अंतर्गत राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी। इन प्रदर्शनियों के माध्यम से भारतीय सभ्यता, आध्यात्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक धरोहरों, तीर्थस्थलों, लोकजीवन और सांस्कृतिक विविधता को कला एवं छायाचित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। देश-विदेश के कलाकारों और छायाकारों की रचनाएं इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयाम प्रदान करेंगी।
रंगोली और बाल चित्रकला प्रतियोगिताएं भी होंगी आयोजित
नई पीढ़ी में रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से रंगोली प्रतियोगिता, बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता तथा अन्य छोटे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा। इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों और युवा प्रतिभाओं को भारतीय संस्कृति, परंपराओं और कलात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
संस्कृति के संरक्षण के साथ भविष्य की पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास
संस्कृति संसद का मूल उद्देश्य भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की गौरवशाली विरासत के रूप में प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उसे वर्तमान की सामाजिक आवश्यकताओं और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप सशक्त बनाना है। संतों के आध्यात्मिक मार्गदर्शन, विद्वानों के वैचारिक विमर्श, वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण, कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति और युवाओं की सक्रिय सहभागिता के माध्यम से यह आयोजन भारतीय संस्कृति के व्यापक स्वरूप को सामने लाएगा।
गंगा महासभा के तत्वावधान में आयोजित होने वाली संस्कृति संसद को अखिल भारतीय संत समिति, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री काशी विद्वत परिषद सहित विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं का मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त है। आयोजकों का विश्वास है कि काशी से प्रारंभ होने वाला यह सांस्कृतिक विमर्श राष्ट्रीय स्तर पर नई सांस्कृतिक चेतना का संचार करेगा तथा भारतीय संस्कृति की वैश्विक प्रतिष्ठा को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक होगा।
What's Your Reaction?
