मनुस्मृति में संशोधन नहीं, शास्त्रों में प्रक्षेप और चोरी हुई पांडुलिपियों को सामने लाना उद्देश्य: स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती
संस्कृति संसद में स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने स्पष्ट किया कि हमारा उद्देश्य मनुस्मृति या शास्त्रों में संशोधन नहीं, बल्कि उनमें हुए प्रक्षेप, मिलावट और भारत से चोरी होकर विदेशों में पहुंची पांडुलिपियों का पर्दाफाश करना है। उन्होंने काशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा जो अगले दो वर्षों में चीन, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा सहित विदेशों में रखी भारतीय पांडुलिपियों की पहचान कर उन्हें वापस लाने का प्रयास करेगी।
संस्कृति संसद में स्वामी जीतेन्द्रानन्द का प्रस्ताव - काशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति बनेगी, दो साल में विदेशों से लाएंगे पांडुलिपियां
वाराणसी।
संस्कृति संसद में मनुस्मृति और भारतीय धर्मशास्त्रों से जुड़े विमर्श को संबोधित करते हुए गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि हमारा उद्देश्य शास्त्रों में संशोधन करना नहीं है। शास्त्रों में संशोधन करना न हमारी औकात है और न ही हमारा अधिकार।
उन्होंने कहा कि हमारा विषय यह है कि भारतीय धर्मशास्त्रों में कहां और किस प्रकार प्रक्षेप किए गए, किन मूल ग्रंथों में मिलावट हुई और भारत की बहुमूल्य पांडुलिपियां किस प्रकार विदेशों में पहुंचीं। इन सबका पर्दाफाश करना और अपनी बौद्धिक संपदा को वापस लाना आवश्यक है।
छापाखाना और विलियम जोन्स का उल्लेख:
स्वामी जी ने कहा कि भारत में वर्ष 1556 में गोवा के पणजी में बाइबिल के मुद्रण के लिए छापाखाने की मशीन आई। इससे पहले ऋषि-मुनि ताड़पत्रों पर लेखन करते थे। सनातन परंपरा को लेकर अनेक प्रश्न खड़े किए गए। गोस्वामी तुलसीदास और सूरदास के जन्म को लेकर भी विवाद खड़े किए गए।
उन्होंने 1793 से पहले की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में शासन स्थापित करने के बाद अंग्रेजों को हिंदू लॉ बनाने के नाम पर धर्मशास्त्रों और पांडुलिपियों का संग्रह किया गया। विलियम जोन्स के समय बंगाल के ब्राह्मणों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में लगाए गए एक चित्र में भारतीय ब्राह्मण को जूते के नीचे बैठा दिखाया गया है। ऐसे साक्ष्यों को समाज के सामने लाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत से पांडुलिपियां लोहे के बक्सों में भरकर ब्रिटेन भेजी गईं। रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन और लॉर्ड टिग्नामेंट बाउंस से संबंधित एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें लिखा था कि यदि संबंधित व्यक्ति जीवित लौट आए तो पांडुलिपियां वापस कर दी जाएं, मृत्यु होने पर इच्छानुसार उपयोग किया जा सकता है। यह पत्र आज भी उपलब्ध है।
मनुस्मृति पर स्पष्टीकरण:
मनुस्मृति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ‘कलौ पराशर स्मृति’ की परंपरा को ध्यान में रखते हुए मनुस्मृति में संशोधन की बात हम सोचते भी नहीं। हमारा प्रश्न यह है कि मनु और पितृसत्ता के नाम पर सनातन धर्म को कठघरे में खड़ा किया जाता है। जिस देश में नारी को शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, वहां सनातन को घेरने के प्रयासों का उत्तर प्रमाणों के साथ देना होगा।
समिति गठित करने का प्रस्ताव:
स्वामी जी ने श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता और पूज्य आचार्यों के संरक्षण में एक समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। यह समिति सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर कार्य करेगी और अगले दो वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों में उपलब्ध भारतीय बौद्धिक संपदा की पहचान कर वहां रखी पांडुलिपियों को भारत वापस लाने का प्रयास करेगी।
उन्होंने बताया कि भारत की अनेक पांडुलिपियां चीन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा में हैं। कुछ कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी में और कुछ रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में हैं। इसके लिए भारत सरकार के पांडुलिपि मिशन और विदेश यात्रा करने वाले संतों का सहयोग लिया जाएगा।
अंत में उन्होंने कहा कि हमारा विचार शास्त्रों में संशोधन का नहीं, बल्कि दुनिया में हिंदू धर्मशास्त्रों में की गई कथित मिलावट, फर्जी ग्रंथों को मूल शास्त्र के रूप में प्रस्तुत किए जाने और मूल पांडुलिपियों की चोरी का पर्दाफाश करना है। इन प्रक्षेपों की आड़ में ब्राह्मणों को गालियां दी जा रही हैं, अब इसका पटाक्षेप होना आवश्यक है।
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