जीवित्पुत्रिका व्रत आज, 4 अक्टूबर को होगा पारणा
संतान की दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना से माताओं द्वारा रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। रविवार, 4 अक्टूबर को व्रती महिलाएं पारणा करेंगी। इस व्रत में जीमूतवाहन की कथा का विशेष महत्व है। मिथिला से लेकर ओडिशा तक इसकी अलग-अलग लोकपरंपराएं प्रचलित हैं।
संतान की दीर्घायु और मंगलकामना का पर्व है जीवित्पुत्रिका व्रत
आचार्य डॉ. धीरेन्द्र मनीषी, काशी
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे लोकभाषा में जिउतिया भी कहा जाता है, संतान के दीर्घ, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना से माताओं द्वारा किया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जा रहा है, जबकि 4 अक्टूबर, रविवार को पारणा होगा।
इस व्रत की परंपरा में पुत्र के साथ पुत्री के जीवन और सुख-समृद्धि की कामना भी निहित मानी जाती है। ‘पुत्रिका’ का अर्थ पुत्र या पुत्री के लिए निर्दिष्ट से जुड़ा है। व्रत-उपवास की परंपरा के पीछे स्वास्थ्य संबंधी सामान्य विचार भी बताए जाते हैं, हालांकि इसका मूल स्वर संतान के जीवन और कल्याण की मंगलकामना है। बड़ी आयु की संतान के लिए भी माताएं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत में जीमूतवाहन की कथा का विशेष महत्व है। इसका वर्णन भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के द्वितीय भाग के अध्याय 15 में बताया गया है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन को शंखचूड़ नामक नाग के बारे में उसकी माता से जानकारी मिली कि गरुड़ उसे अपना आहार बनाने वाले हैं। शंखचूड़ के जीवन की रक्षा के लिए जीमूतवाहन ने स्वयं को गरुड़ के सामने समर्पित कर दिया। जीमूतवाहन के इस त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने शंखचूड़ को छोड़ दिया और उसके परिवार को अभयदान दिया।
धर्मग्रंथों के संदर्भ में इस व्रत को लेकर विभिन्न परंपराएं मिलती हैं। निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु में जीवित्पुत्रिका व्रत का उल्लेख नहीं मिलता, जबकि आश्विन कृष्ण अष्टमी के संदर्भ में महालक्ष्मी व्रत का वर्णन मिलता है। पुराणों में इसे पुत्र, सौभाग्य, राज्य और आयुष्य प्रदान करने वाला बताया गया है।
पंडित भवनाथ झा के अनुसार जीवित्पुत्रिका अथवा जीमूतवाहन व्रत का प्रथम उल्लेख मिथिला के शुभंकर ठाकुर द्वारा लगभग 1600 ईस्वी में मिलता है। मिथिला के कृत्यसार समुच्चय में इसे जीवित्पुत्रिका व्रत कहा गया है, जिसका लोकभाषा में अपभ्रंश रूप जिउतिया प्रचलित हुआ। इस आधार पर इसे मिथिला क्षेत्र की महत्वपूर्ण व्रत-परंपरा माना जाता है।
ओडिशा में भी इस व्रत का व्यापक रूप से पालन किया जाता है, विशेषकर पश्चिमी ओडिशा में। वहां इसे पूअ-जिउतिया कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसके अनुकरण पर भाई-जिउतिया की परंपरा भी मिलती है। ओडिशा की लोकपरंपरा में जीमूतवाहन को दुतिवाहन कहे जाने का भी उल्लेख मिलता है।
इस व्रत से जुड़ी खान-पान की लोकपरंपराएं भी विशेष हैं। ओडिशा में खरोई, जिसे ओड़िया में जन्ही कहा जाता है, की सब्जी बनाए जाने की परंपरा है। इसे संस्कृत में सप्त-पुत्रिका कहा जाता था, जिसका अपभ्रंश रूप भोजपुरी क्षेत्र में सतपुतिया के रूप में प्रचलित है। इसमें सामान्यतः सात, जबकि कहीं-कहीं पांच से आठ या नौ तक धारियां होती हैं। प्राचीन परंपरा में संतान के लिए ‘अष्टपुत्रवती भव’ का आशीर्वाद दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत केवल उपवास की धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि त्याग, करुणा, मातृ-स्नेह और संतान के मंगल की सामूहिक लोकभावना से जुड़ा पर्व है। जीमूतवाहन की कथा इसके केंद्र में त्याग और दूसरे के जीवन की रक्षा का संदेश देती है।
इस पावन अवसर पर सभी माताओं और बहनों को कठिन जीवित्पुत्रिका व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं एवं मंगलकामनाएं।
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