संतान की दीर्घायु का लोकपर्व : जीवित्पुत्रिका व्रत

जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय लोकसंस्कृति में मातृत्व, त्याग और संतान के मंगल की कामना का महत्वपूर्ण पर्व है। आश्विन कृष्ण अष्टमी को मनाए जाने वाले इस व्रत का संबंध राजा जीमूतवाहन की त्याग और जीवन-संरक्षण की कथा से जोड़ा जाता है। पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित यह परंपरा आज धार्मिक आस्था के साथ-साथ संतान के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के व्यापक सामाजिक संदेश का भी प्रतीक बन रही है।

Oct 3, 2026 - 14:57
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संतान की दीर्घायु का लोकपर्व : जीवित्पुत्रिका व्रत

जीवित्पुत्रिका व्रत : जब मां की ममता बन जाती है तपस्या

कुँवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह

एडवोकेट/पत्रकार एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, प्रेस क्लब, गोरखपुर

भारतीय संस्कृति का प्राण उसकी पर्व-परंपरा में स्पंदित होता है। यहां पर्व केवल तिथि विशेष पर संपन्न होने वाला कर्मकांड नहीं, बल्कि पीढ़ियों से प्रवाहित जीवन-दर्शन, लोकविश्वास और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है। भारतीय लोकजीवन में ऐसे अनेक पर्व हैं, जिनके केंद्र में परिवार, प्रकृति, समाज और मानवीय संबंधों की गरिमा प्रतिष्ठित है। जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे लोकभाषा में जितिया या जिउतिया कहा जाता है, इसी समृद्ध परंपरा का ऐसा पर्व है जिसमें मातृत्व की ममता तपस्या का रूप धारण कर लेती है।

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से उत्तर भारत के पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में श्रद्धापूर्वक किया जाता है। संतान की दीर्घायु, आरोग्य और मंगल की कामना से माताएं इस व्रत का संकल्प लेती हैं। कहीं यह निर्जला उपवास के रूप में रखा जाता है तो कहीं स्थानीय परंपराओं के अनुरूप इसकी विधियों में भिन्नता दिखाई देती है। किंतु इन विविधताओं के बीच इसकी आत्मा एक ही है—संतान के जीवन की मंगलकामना।

‘जीवित्पुत्रिका’ नाम में ही इस व्रत का भाव निहित है। ‘जीवित’ अर्थात जीवन से संपन्न और ‘पुत्रिका’ अर्थात संतान। व्यापक अर्थ में यह उस संतान के लिए मंगलकामना है, जिसे मां अपने जीवन का विस्तार मानती है। इसीलिए इस व्रत को केवल धार्मिक अनुष्ठान मान लेना उसके भाव-संसार को सीमित कर देना होगा। यह भारतीय मातृत्व की उस अनकही भाषा का पर्व है, जिसमें मां अपने सुख से पहले अपनी संतान के सुख को रखती है।

जीमूतवाहन की कथा और त्याग का आदर्श

जीवित्पुत्रिका व्रत की लोकमान्यता राजा जीमूतवाहन की कथा से गहरे रूप में जुड़ी है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन दया, करुणा और परोपकार के लिए प्रसिद्ध थे। एक अवसर पर उन्हें ज्ञात हुआ कि नागवंश के शंखचूड़ को गरुड़ के लिए आहार के रूप में प्रस्तुत किया जाना है। शंखचूड़ की रक्षा के लिए जीमूतवाहन स्वयं उसके स्थान पर गरुड़ के सामने प्रस्तुत हो गए।

कथा का यह प्रसंग भारतीय चिंतन में त्याग की उस ऊंचाई को रेखांकित करता है, जहां मनुष्य अपने प्राणों की चिंता से ऊपर उठकर दूसरे के जीवन की रक्षा को अपना धर्म मान लेता है। जीमूतवाहन का चरित्र इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें करुणा केवल भाव नहीं, बल्कि कर्म बन जाती है। उनका आत्मोत्सर्ग जीवन के प्रति उस आदर का प्रतीक है, जिसमें किसी दूसरे प्राणी का जीवन भी उतना ही मूल्यवान माना जाता है जितना अपना।

यही कथा जीवित्पुत्रिका की सांस्कृतिक चेतना को गहराई प्रदान करती है। मां संतान के लिए व्रत करती है और लोककथा त्याग एवं जीवन-संरक्षण का आदर्श सामने रखती है। इस प्रकार पर्व में ममता और त्याग, दोनों एक ही भावधारा में प्रवाहित होते दिखाई देते हैं।

जब ममता तपस्या बन जाती है

मां और संतान का संबंध संसार के सबसे सहज, फिर भी सबसे गहरे संबंधों में एक है। संतान के सुख में मां का सुख और उसके कष्ट में मां की पीड़ा सहज ही समाहित हो जाती है। जीवित्पुत्रिका व्रत इसी मातृभाव का सांस्कृतिक रूपांतरण है।

व्रत रखने वाली माताएं कठिन उपवास और धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से अपनी संतान के स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की प्रार्थना करती हैं। यह दृश्य भारतीय लोकजीवन की उस संवेदनशील परंपरा को सामने लाता है, जहां प्रार्थना व्यक्तिगत आकांक्षा न रहकर परिवार के भविष्य की कामना बन जाती है।

व्रत का बाहरी स्वरूप चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, उसकी अंतरात्मा में प्रेम ही है। यह प्रेम प्रदर्शन नहीं मांगता। वह मौन रहता है, तपता है और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना में स्वयं को अनुशासित करता है। शायद यही कारण है कि जीवित्पुत्रिका का व्रत लोकमानस में केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मातृत्व की भावनात्मक गरिमा का प्रतीक बन गया है।

लोकगीतों में उतरती ममता

भारतीय लोकसंस्कृति की विशेषता रही है कि उसने अपने गहनतम भावों को पुस्तकों से अधिक लोकगीतों में सुरक्षित रखा। जीवित्पुत्रिका के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों में मां की चिंता, आशा, प्रार्थना और वात्सल्य सहज शब्दों में अभिव्यक्त होते हैं।

इन गीतों की भाषा भले ही क्षेत्र विशेष की लोकभाषा हो, किंतु उनका भाव सार्वभौमिक है। मां की प्रार्थना की कोई बोली नहीं होती। उसकी आंखों में संतान के लिए जो स्वप्न होते हैं, वे भाषा और भूगोल की सीमाओं से परे होते हैं। इसीलिए जितिया के लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकस्मृति के जीवंत दस्तावेज हैं।

इन गीतों में पीढ़ियों का अनुभव बोलता है। दादी से मां और मां से बेटी तक पहुंचती यह मौखिक परंपरा हमारी सांस्कृतिक स्मृति को निरंतरता प्रदान करती है। आधुनिकता के तीव्र प्रवाह में जब लोकगीतों और लोकाचारों का संसार सिकुड़ रहा है, तब ऐसे पर्व हमारी सांस्कृतिक जड़ों को सींचने का कार्य करते हैं।

परंपरा का आधुनिक अर्थ

परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे समय के साथ अपने मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए नए संदर्भों से संवाद करती हैं। जीवित्पुत्रिका व्रत का आधुनिक अर्थ भी इसी दृष्टि से समझना चाहिए।

आज संतान की दीर्घायु की कामना का अर्थ केवल लंबा जीवन नहीं है। स्वस्थ शरीर, संतुलित मन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित परिवेश, संस्कारयुक्त व्यक्तित्व और सम्मानजनक भविष्य—ये सभी संतान के कल्याण के अभिन्न अंग हैं। यदि मां अपनी संतान के लिए व्रत रखती है तो समाज का दायित्व है कि वह प्रत्येक बच्चे के लिए ऐसा वातावरण निर्मित करे, जिसमें वह भय और अभाव से मुक्त होकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके।

यहीं से जीवित्पुत्रिका का धार्मिक भाव एक व्यापक सामाजिक संदेश में परिवर्तित हो जाता है। संतान का भविष्य केवल माता-पिता की निजी चिंता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी भी है।

पुत्र नहीं, संतान के मंगल का पर्व

समय के साथ हमारी सामाजिक चेतना में भी परिवर्तन आया है। आज पुत्र और पुत्री के बीच भेद की मानसिकता को पीछे छोड़कर प्रत्येक संतान को समान अवसर और समान सम्मान देना आवश्यक है। इसलिए जीवित्पुत्रिका व्रत की मूल भावना को ‘पुत्र’ की संकीर्ण अवधारणा से आगे बढ़ाकर संतान के कल्याण के व्यापक अर्थ में देखना अधिक सार्थक होगा।

मां की ममता पुत्र या पुत्री में भेद नहीं करती। उसकी प्रार्थना केवल इतनी होती है कि उसकी संतान स्वस्थ रहे, सुरक्षित रहे और जीवन में आगे बढ़े। आधुनिक समाज में यही भावना इस पर्व को और अधिक मानवीय एवं समावेशी बना सकती है।

लोक से लोकमंगल तक

भारतीय पर्वों की सार्थकता इसी में है कि वे व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से और समाज को व्यापक लोकमंगल से जोड़ते हैं। जीवित्पुत्रिका भी इसी सांस्कृतिक यात्रा का पर्व है।

जीमूतवाहन की कथा त्याग का संदेश देती है। माताओं का व्रत ममता की शक्ति का परिचय कराता है। लोकगीत सांस्कृतिक स्मृति को बचाते हैं और सामूहिक अनुष्ठान सामाजिक एकता को पुष्ट करते हैं। इन सबको एक साथ देखें तो जीवित्पुत्रिका केवल एक व्रत नहीं रह जाता; वह भारतीय समाज की उस जीवनदृष्टि का प्रतीक बन जाता है, जिसमें दूसरे के जीवन के लिए चिंता करना ही मनुष्यता का सर्वोच्च संस्कार माना गया है।

आज जब जीवन की गति तेज है, परिवार छोटे होते जा रहे हैं और पारंपरिक संवाद के अनेक माध्यम विलुप्त होने के कगार पर हैं, तब जीवित्पुत्रिका जैसे पर्व हमें अपनी सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि तकनीक बदल सकती है, जीवनशैली बदल सकती है, सामाजिक संरचनाएं बदल सकती हैं, लेकिन मां की ममता की भाषा नहीं बदलती।

जीवित्पुत्रिका व्रत इसलिए केवल अतीत की परंपरा नहीं, वर्तमान की संवेदना भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि संतान की दीर्घायु की प्रार्थना के साथ उसके सुसंस्कार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयत्न करना भी उतना ही आवश्यक है।

अंततः जितिया की लौ किसी एक घर के आंगन में जलने वाला दीप मात्र नहीं है। वह भारतीय मातृत्व की उस अखंड ज्योति का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से अपने स्नेह, त्याग और मंगलकामना से परिवार और समाज को आलोकित करती आई है। मां की प्रार्थना में संतान का जीवन है और संतान के उज्ज्वल भविष्य में समाज का भविष्य। यही जीवित्पुत्रिका व्रत का शाश्वत संदेश है।

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Keshav Shukla साहित्यकार, उद्घोषक, पत्रकार