हिन्दी हृदय की भाषा, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में मिले उचित स्थान : डॉ. मानसी
एमटी यूनिवर्सिटी में हिन्दी पखवाड़े के तहत ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में हिन्दी की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित हुई। मुख्य वक्ता डॉ. मानसी ने हिन्दी को आत्मीयता और संवाद की भाषा बताते हुए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के मंच पर इसके व्यापक प्रयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
लखनऊ। हिन्दी पखवाड़े के अवसर पर एमटी यूनिवर्सिटी में मंगलवार को ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में हिन्दी की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य वक्ता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं विचारक डॉ. मानसी रहीं।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. मानसी ने कहा कि हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हृदय की भाषा है। उन्होंने कहा, “हिन्दी कानों के जरिए सीधे कलेजे तक दस्तक देती है, इसीलिए हम उसे मातृभाषा कहते हैं।” उन्होंने कहा कि जिस भाषा को व्यक्ति अपनी मां से सीखता है, उसका आरोह-अवरोह, वर्तनी और प्रयोग उसके संस्कारों में गहराई से रचा-बसा होता है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में हिन्दी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मध्यस्थता का मूल उद्देश्य दो पक्षों के बीच संवाद स्थापित कर विवाद का समाधान करना है। आत्मीय संवाद इस प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकता है। उन्होंने कहा कि भारत न्याय और मध्यस्थता के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, ऐसे में हिन्दी को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर उचित स्थान मिलना चाहिए।
अंग्रेजी के प्रयोग पर डॉ. मानसी ने कहा कि कई परिस्थितियों में अंग्रेजी आवश्यकता बन जाती है, लेकिन कई बार इसका प्रयोग केवल दिखावे तक सीमित रह जाता है। उन्होंने मातृभाषा की सहजता की तुलना घर लौटकर आरामदायक कपड़े पहनने और घर का बना भोजन करने से करते हुए कहा कि अपनी भाषा में संवाद करने का सुकून अलग होता है।
अपने वक्तव्य के अंत में डॉ. मानसी ने स्वरचित कविता की पंक्तियां सुनाईं—
“हिन्दी हमारी मां सरीखी, हम सभी संतान हैं,
हम इसी हिन्दी के बल पर बन गए दिनमान हैं।
भाल पर हिन्दी के उसे बिंदी से सजाना चाहती हूं,
है यही अरमान, हिन्दी तुझमें रमना चाहती हूं।”
कार्यक्रम के समापन पर विश्वविद्यालय के निदेशक प्रोफेसर तपन कुमार चंडोला ने पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक के रूप में गमले में पौधा भेंट कर डॉ. मानसी को सम्मानित किया। उन्होंने डॉ. मानसी के विचारों की सराहना करते हुए हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
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