पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा को राजवल्लभ साहित्य सम्मान–2026
सेवराई/बठिंडा/देवरिया,
2 अक्टूबर 2026।
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा को प्रेस्टिज संस्थान, देवरिया (उत्तर प्रदेश) द्वारा प्रतिष्ठित ‘राजवल्लभ साहित्य सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया। महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में उन्हें 21 हजार रुपये की सम्मान राशि, माँ सरस्वती का स्मृति-चिह्न, शाल, साइटेशन तथा ‘राजवल्लभ साहित्य सम्मान–2026’ का प्रतीक-चिह्न प्रदान किया गया।
डॉ. कुशवाहा मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के भदौरा क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनके पिता श्री राम चरण सिंह कुशवाहा किसान हैं। सामान्य ग्रामीण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर उच्च शिक्षा, अध्यापन, शोध और साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. कुशवाहा वर्तमान में पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत हैं।
पूर्व में भी मिल चुके हैं कई प्रतिष्ठित सम्मान
डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा को साहित्य और हिंदी भाषा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए इससे पूर्व भी कई महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वर्ष 2022 में भाऊराव देवरस न्यास द्वारा ‘पं. प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान–2022’ से उन्हें सम्मानित किया गया था।
इसी क्रम में वर्ष 2025 में हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित ‘चवाकुल नृसिंह मूर्ति स्मृति नागरी सम्मान’ प्रदान किया गया।
तीन पुस्तकों के लेखक और 50 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित
डॉ. कुशवाहा की साहित्यिक एवं अकादमिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-
1. समकालीन पत्रकारिता : विज्ञापन और स्त्री
2. विज्ञापन : कल, आज और कल
3. वैश्विक हिंदी : स्थिति और चिंतन
इसके अतिरिक्त उनके 50 से अधिक शोधपत्र विभिन्न शोध एवं अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘शोधवार्ता’ के संपादक भी हैं।
‘बोधकथाओं का वैश्विक परिदृश्य’ पर दिया व्याख्यान
सम्मान समारोह के साथ ‘बोधकथाओं का वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर विशेष संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इसमें डॉ. कुशवाहा ने भारतीय बोधकथा परंपरा के वैश्विक विस्तार और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
उन्होंने पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाओं और भारतीय लोककथाओं से लेकर ईसप की नीतिकथाओं, मध्य-पूर्व की हिकमत एवं सूफी परंपरा, ईसाई दृष्टांतों, चीनी-जापानी कथा परंपरा, अफ्रीकी अनांसी कथाओं तथा लैटिन अमेरिकी एवं आदिवासी कथा-परंपराओं तक का उल्लेख करते हुए कहा कि बोधकथाएँ किसी एक देश, भाषा या संस्कृति की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता की साझा सांस्कृतिक विरासत हैं।
उन्होंने कहा कि “बोधकथा केवल नैतिक उपदेश देने वाली विधा नहीं है, बल्कि अनुभव के माध्यम से जीवन-बोध, विवेक और सामाजिक चेतना विकसित करने वाली साहित्यिक परंपरा है।”
पंचतंत्र की वैश्विक यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय कथा-साहित्य की अनेक कथाएँ विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों तक पहुँचीं तथा ‘कलीला व दिमना’ के माध्यम से अरब साहित्यिक संसार में भी उनका महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।
डॉ. कुशवाहा ने कहा कि भारत का बंदर-मगरमच्छ, यूनान की लोमड़ी-अंगूर, अरब के सियार, अफ्रीका का अनांसी और चीन-जापान का बलिदानी बंदर-राजा भले ही अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेशों की कथाएँ हों, लेकिन इनके भीतर निहित मानवीय अनुभव एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। यही बोधकथाओं की वैश्विक शक्ति है।
उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बोधकथाओं की उपयोगिता पर भी चर्चा की और कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में Value Added Course (VAC) जैसे पाठ्यक्रमों के माध्यम से कथा-साहित्य को विद्यार्थियों के जीवन-मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक विवेक से जोड़ा जा सकता है।
साहित्य और शोध के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने डॉ. कुशवाहा के साहित्य, शोध और अध्यापन के क्षेत्र में सक्रिय योगदान की चर्चा की। प्रेस्टिज संस्थान के संरक्षक एवं प्रेस्टिज इंटर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. शिवनारायण सिंह, जो स्वयं बोधकथा साहित्य के चर्चित रचनाकार हैं, के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्य और शिक्षा जगत से जुड़े अनेक विद्वान उपस्थित रहे। डॉ. शिवनारायण सिंह की बोधकथाओं पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी किए जा रहे हैं।
समारोह में प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, प्रो. सुमन प्रसाद, प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. यशवंत यादव, श्रीमती शिवा सिंह सहित देवरिया के अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षक एवं सैकड़ों विद्यार्थी उपस्थित रहे।
डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा ने सम्मान के लिए प्रेस्टिज संस्थान, डॉ. शिवनारायण सिंह, आयोजन समिति तथा उपस्थित साहित्यकारों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और शिक्षा की सार्थकता इसी में है कि वे समाज में संवेदना, विवेक, संवाद और मानवीय मूल्यों को मजबूत करें।
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