दक्षिण भारतीय मूर्तिकला में महिषमर्दिनी : पाषाण में साकार आदिशक्ति का वैभव
भारतीय संस्कृति में महिषमर्दिनी नारीशक्ति और धर्मरक्षा की प्रतीक हैं। दक्षिण भारतीय मंदिरों की मूर्तिकला में उनका स्वरूप केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शिल्प, अध्यात्म और परम्परा का अद्भुत संगम है। मार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य से लेकर महाबलीपुरम से तंजावुर तक, शिल्पकारों ने आदिशक्ति के दिव्य वैभव को पाषाण पर जीवंत किया है।
दक्षिण भारतीय मूर्तिकला में साकार आदिशक्ति महिषमर्दिनी का दिव्य वैभव
कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष, गोरखपुर प्रेस क्लब
भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति में महिषमर्दिनी देवी का स्वरूप नारीशक्ति, धर्मरक्षा तथा दुष्टता के विनाश का अप्रतिम प्रतीक है। देवी दुर्गा का यह रूप केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, अपितु भारतीय मूर्तिकला, पौराणिक आख्यानों, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक परम्पराओं का ऐसा सजीव प्रतिरूप है, जिसमें शक्ति की दिव्यता और शिल्प की कलात्मकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विशेषतः दक्षिण भारतीय मंदिरों की मूर्तिकला में महिषमर्दिनी की प्रतिमाएँ भारतीय कलाकारों की सूक्ष्म दृष्टि, कल्पनाशीलता, शास्त्रीय ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभूति की अनुपम अभिव्यक्ति हैं।
महिषमर्दिनी की उपासना का मूलाधार वह पौराणिक आख्यान है, जिसमें महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवगण उसकी पराजय के लिए परमशक्ति की आराधना करते हैं। मार्कण्डेय पुराण के अन्तर्गत वर्णित देवीमाहात्म्य अथवा दुर्गासप्तशती के अनुसार, महिषासुर ने अपनी असाधारण शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु, भगवान शिव तथा अन्य देवताओं के तेज से एक दिव्य महाशक्ति का प्राकट्य हुआ। समस्त देवताओं ने अपने-अपने आयुध और शक्तियाँ उस देवी को अर्पित कीं। इस प्रकार आविर्भूत आदिशक्ति ने महिषासुर के साथ भीषण युद्ध कर उसका वध किया और देवताओं को पुनः उनका अधिकार दिलाया। इसी दैवी पराक्रम के कारण वे महिषासुरमर्दिनी अथवा महिषमर्दिनी के नाम से विख्यात हुईं।
यह आख्यान केवल देवासुर संग्राम का वर्णन नहीं करता, बल्कि भारतीय अध्यात्म के उस शाश्वत सत्य को भी उद्घाटित करता है, जिसके अनुसार जब अधर्म, अहंकार और अत्याचार अपनी सीमाएँ लाँघने लगते हैं, तब धर्म तथा लोककल्याण की रक्षा के लिए शक्ति का जागरण अनिवार्य हो जाता है। महिषासुर का महिषरूप अज्ञान, जड़ता, उच्छृंखलता और आसुरी प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक बोध कराता है, जबकि देवी का सिंहवाहन निर्भीकता, पराक्रम और धर्मसंरक्षण का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार महिषमर्दिनी का स्वरूप मनुष्य को बाह्य दुष्टता के साथ-साथ अपने भीतर विद्यमान अहंकार, मोह और विकारों पर विजय प्राप्त करने की आध्यात्मिक प्रेरणा भी देता है।
देवीमाहात्म्य में वर्णित महिषासुर-वध भारतीय धार्मिक चेतना में निहित स्त्रीशक्ति की प्रतिष्ठा का भी महत्त्वपूर्ण उद्घोष है। यहाँ शक्ति किसी की आश्रिता नहीं, अपितु समस्त दैवी सामर्थ्य का समन्वित स्वरूप है। देवी की विजय यह प्रतिपादित करती है कि सृष्टि के संतुलन, समाज की सुरक्षा और धर्म की प्रतिष्ठा में नारीशक्ति की भूमिका अनिवार्य है। नवरात्रि में देवी की आराधना तथा विजयादशमी का पर्व इसी विजयगाथा को लोकजीवन में पुनर्जीवित करते हैं। ये पर्व हमें स्मरण कराते हैं कि शक्ति का वास्तविक प्रयोजन विनाश मात्र नहीं, बल्कि अन्याय का उन्मूलन, मर्यादा की स्थापना और लोकमंगल का संवर्धन है।
महिषमर्दिनी के स्वरूप का उल्लेख अनेक धार्मिक एवं शिल्पशास्त्रीय परम्पराओं में मिलता है। देवी को दुर्गा, चण्डिका, अम्बिका, कात्यायनी, भद्रकाली, शूलिनी तथा विन्ध्यवासिनी जैसे विविध नामों से सम्बोधित किया गया है। यद्यपि इन नामों के अपने विशिष्ट पौराणिक एवं उपासना-सम्बन्धी सन्दर्भ हैं, तथापि व्यापक शक्तिपरम्परा में ये आदिशक्ति के विभिन्न रूपों का बोध कराते हैं। देवी के अनेक हाथ उनकी बहुविध सामर्थ्य के प्रतीक हैं। उनके हाथों में धारण किये गये त्रिशूल, चक्र, खड्ग, धनुष-बाण तथा अन्य आयुध दुष्ट शक्तियों के दमन और धर्म की रक्षा के संकल्प को अभिव्यक्त करते हैं।
दक्षिण भारतीय मूर्तिकला में महिषमर्दिनी की प्रतिमाओं का अध्ययन करने से पूर्व प्रतिमालक्षण-सम्बन्धी ग्रन्थों तथा शिल्पशास्त्रीय निर्देशों का अवलोकन विशेष महत्त्व रखता है। अग्निपुराण में देवी के विभिन्न भुजाओं वाले स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। शारदातिलक तथा प्रपञ्चसारतन्त्र जैसे ग्रन्थों में भी देवी के ध्यान, स्वरूप और उपासना से सम्बन्धित विवरण उपलब्ध हैं। इन ग्रन्थों की परम्परा ने भारतीय प्रतिमा-विज्ञान को वैचारिक आधार प्रदान किया। शिल्पशास्त्रीय विधान के अनुसार देवी के आयुध, मुद्रा, वाहन, मुखाभिव्यक्ति और शरीर-विन्यास का अपना विशिष्ट धार्मिक एवं प्रतीकात्मक महत्त्व है। सिंह को देवी के वाहन के रूप में अथवा उनके समीप उत्कीर्ण करना भी इस प्रतिमा-परम्परा का एक प्रमुख लक्षण रहा है। तथापि विभिन्न ग्रन्थों, क्षेत्रों और ऐतिहासिक कालखण्डों में प्रतिमाओं के स्वरूप तथा आयुध-विन्यास में भिन्नताएँ भी दिखाई देती हैं।
दक्षिण भारत की ऐतिहासिक मंदिर-परम्परा में महिषमर्दिनी की प्रतिमाएँ विशेष कलात्मक महत्त्व रखती हैं। पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल तथा अन्य दक्षिण भारतीय राजवंशों के काल में मंदिर-निर्माण और प्रस्तर-मूर्तिकला का उल्लेखनीय विकास हुआ। इन राजवंशों के संरक्षण में निर्मित धार्मिक स्थापत्य ने देवी के विविध स्वरूपों को शिल्पगत अभिव्यक्ति प्रदान की। तमिलनाडु के महाबलीपुरम स्थित महिषासुरमर्दिनी गुफा-मंदिर का प्रसिद्ध उत्कीर्णन इस परम्परा का अत्यन्त प्रभावशाली उदाहरण है। पल्लवकालीन शिल्पकारों ने विशाल प्रस्तर-पटल पर देवी और महिषासुर के मध्य चल रहे संग्राम को जिस गतिशीलता, संतुलन और सजीवता के साथ उकेरा है, वह भारतीय शिल्पकला की असाधारण उपलब्धि है। देवी सिंह पर आरूढ़ होकर असुर की ओर अग्रसर हैं; उनके आयुध, सहचर शक्तियाँ और युद्धरत आकृतियाँ समूचे दृश्य को नाटकीय ऊर्जा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत महिषासुर की प्रतिरोधात्मक मुद्रा संघर्ष की तीव्रता को मूर्त कर देती है।
महाबलीपुरम की यह प्रतिमा केवल धार्मिक कथानक का प्रस्तरांकन नहीं है, बल्कि गति, साहस, लय और भावाभिव्यक्ति का उत्कृष्ट कलात्मक विधान भी है। शिल्पकार ने कठोर पत्थर में युद्ध की उथल-पुथल, देवी के आत्मविश्वास और दैवी शक्ति की प्रभावोत्पादकता को जिस कौशल से रूपायित किया है, उससे स्पष्ट होता है कि भारतीय मूर्तिकार के लिए प्रतिमा-निर्माण केवल शारीरिक आकृतियों की रचना नहीं, बल्कि किसी गहन आध्यात्मिक अनुभूति को दृश्य रूप प्रदान करने की साधना भी था।
दक्षिण भारतीय मंदिरों की प्रतिमाओं में देवी के स्वरूप का एक उल्लेखनीय पक्ष उनका बहुआयामी व्यक्तित्व है। कहीं वे युद्धरत वीरांगना के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं, तो कहीं भक्तों को अभय प्रदान करने वाली करुणामयी जननी के रूप में। उनके मुखमण्डल पर दृढ़ता और शान्ति का समन्वय, आयुधों में निहित शक्ति, सिंह की गतिशीलता तथा महिषासुर की पराजय का दृश्य—ये सभी तत्त्व मिलकर धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष को मूर्त रूप देते हैं। यही कारण है कि महिषमर्दिनी की प्रतिमा का सौन्दर्य केवल उसके बाह्य विन्यास में नहीं, बल्कि उसमें अन्तर्निहित दार्शनिक अर्थों में भी निहित है।
भारतीय कला में धार्मिक प्रतीकों का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि वे जटिल आध्यात्मिक अवधारणाओं को जनसामान्य के लिए सहज और ग्राह्य बनाते हैं। महिषमर्दिनी की प्रतिमा इसी परम्परा की प्रतिनिधि है। देवी का त्रिशूल विवेक और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन का बोध कराता है, सिंह निर्भीकता का, जबकि असुर पर देवी की विजय आत्मसंयम और धर्मनिष्ठा की महत्ता को उद्घाटित करती है। इस प्रकार प्रतिमा अपने दर्शक के लिए केवल दर्शन का विषय नहीं रहती, बल्कि जीवन-मूल्यों की एक मौन शिक्षिका बन जाती है।
दक्षिण भारतीय मूर्तिकला का यह पक्ष भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को भी रेखांकित करता है। भाषा, वेशभूषा, स्थापत्य-शैली और क्षेत्रीय परम्पराओं में विविधता होने के बावजूद देवी दुर्गा की आराधना सम्पूर्ण भारत को एक साझा आध्यात्मिक सूत्र में बाँधती है। उत्तर भारत में जहाँ नवरात्रि, दुर्गापूजा और विजयादशमी के विविध आयोजन महिषासुर-वध की स्मृति को जनमानस में जीवित रखते हैं, वहीं दक्षिण भारत के मंदिरों में प्रतिष्ठित महिषमर्दिनी की प्रतिमाएँ उसी सांस्कृतिक चेतना को शिल्प के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं। यह विविधता में एकता की भारतीय अवधारणा का सशक्त उदाहरण है।
आज जब भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता निरन्तर अनुभव की जा रही है, तब महिषमर्दिनी जैसी प्रतिमाओं का अध्ययन केवल अतीत के कलात्मक वैभव को जानने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत स्मृति से जुड़ने का अवसर भी है। इन प्रतिमाओं में निहित शिल्पकौशल, धार्मिक प्रतीकात्मकता और दार्शनिक दृष्टि का सम्यक् अध्ययन भारतीय कला-इतिहास को अधिक गहराई से समझने में सहायक है। मंदिरों, शिलालेखों, पुरातात्त्विक अवशेषों तथा प्राचीन ग्रन्थों के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन से इस समृद्ध परम्परा के अनेक अनछुए पक्षों को प्रकाश में लाया जा सकता है।
वस्तुतः दक्षिण भारतीय मूर्तिकला में महिषमर्दिनी का स्वरूप भारतीय संस्कृति की उस अविच्छिन्न धारा का प्रतीक है, जिसमें धर्म आस्था से, आस्था कला से और कला जीवन-दर्शन से सम्बद्ध है। देवी की प्रतिमा हमें यह सन्देश देती है कि शक्ति का सर्वोच्च आदर्श अत्याचार पर विजय, अन्याय का प्रतिरोध और लोककल्याण की स्थापना है। नवरात्रि के पावन अवसर पर महिषमर्दिनी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब हम उनके दिव्य स्वरूप से प्रेरणा ग्रहण कर अपने जीवन में साहस, विवेक, करुणा और न्यायनिष्ठा को प्रतिष्ठित करें। यही महिषमर्दिनी की उपासना का आध्यात्मिक मर्म और भारतीय मूर्तिकला की शाश्वत सांस्कृतिक चेतना है।
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