पंच तत्वों पर विजय का पर्व है विजय दशमी
पंच तत्वों पर विजय का पर्व है विजयादशमी
~ कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार,वरिष्ठ उपाध्यक्ष,गोरखपुर प्रेस क्लब.
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भारतीय संस्कृति का पर्व - वैभव केवल उत्सवधर्मिता का परिचायक नहीं, अपितु सनातन जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय मूल्यों का संवाहक है। विजयादशमी इसी सांस्कृतिक चेतना का ऐसा महापर्व है, जिसमें प्रकृति के पंचमहाभूतों से निर्मित मानव अपनी अंतर्निहित दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। यह पर्व उद्घोष करता है कि वास्तविक विजय बाह्य जगत को परास्त करने में नहीं, बल्कि अंतर्मन में व्याप्त आसुरी प्रवृत्तियों का शमन करने में निहित है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित शरीर तभी सार्थक है, जब उसमें विवेक का प्रकाश, चरित्र की दृढ़ता, विचारों की पवित्रता और आचरण की मर्यादा प्रतिष्ठित हो। इस दृष्टि से विजयादशमी केवल रावण-दहन का पर्व नहीं, बल्कि पंचमहाभूतों से निर्मित जीवन को धर्म, संयम और सदाचार से आलोकित करने का महोत्सव है।
भारतीय अध्यात्म में पंचमहाभूत सृष्टि की आधारभूत शक्तियों के प्रतीक हैं। पृथ्वी धैर्य, धारणशीलता और स्थिरता का बोध कराती है; जल निर्मलता, करुणा और जीवनप्रवाह का; अग्नि तेज, ऊर्जा और आत्मशुद्धि का; वायु प्राणवत्ता, गतिशीलता और स्वतंत्रता का; जबकि आकाश अनंतता, व्यापकता और उदार चेतना का प्रतीक है। इन तत्त्वों पर विजय का अभिप्राय प्रकृति को पराजित करना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों, इच्छाओं और विकारों को विवेक के अनुशासन में रखकर प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। जब मनुष्य पृथ्वी की भांति धैर्यवान, जल की भांति निर्मल, अग्नि की भांति तेजस्वी, वायु की भांति कर्मशील और आकाश की भांति उदार बनता है, तभी उसके व्यक्तित्व में वास्तविक विजय का अवतरण होता है। पंचमहाभूतों का यह दार्शनिक संदर्भ विजयादशमी को आत्मपरिष्कार और आत्मोत्कर्ष का व्यापक अर्थ प्रदान करता है।
आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाने वाला विजयादशमी पर्व रामायणकालीन आख्यान में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का स्मरण कराता है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण में वर्णित लंकाकांड का यह प्रसंग धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का प्रतीक बनकर भारतीय मानस में प्रतिष्ठित है। वनवास, सीताहरण, वानरराज सुग्रीव से मैत्री, हनुमानजी की अतुलनीय भक्ति, समुद्र पर सेतु-निर्माण और लंका का महासंग्राम—ये सभी प्रसंग केवल पौराणिक कथा के घटनाक्रम नहीं, बल्कि साहस, संगठन, निष्ठा, कर्तव्य और धर्मनिष्ठ संकल्प के जीवनोपयोगी सूत्र हैं। श्रीराम की विजय के पीछे केवल धनुष-बाण का पराक्रम नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, मर्यादा का पालन और लोकमंगल की भावना विद्यमान थी।
दशानन रावण का व्यक्तित्व इस पर्व के संदेश को और गहन बनाता है। वह वेद-वेदांगों का ज्ञाता, महापराक्रमी योद्धा, शिव का अनन्य उपासक और असाधारण सामर्थ्य का स्वामी था। किंतु ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ संयम और वैभव के साथ विनम्रता का अभाव उसके पतन का कारण बना। परस्त्री का अपहरण, अहंकारवश शुभ परामर्श की अवहेलना और अपनी शक्ति को मर्यादा से ऊपर मानने की प्रवृत्ति ने उसकी समस्त उपलब्धियों को निष्फल कर दिया। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य के अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अन्य अवगुणों से जोड़कर देखा जाता है। इस प्रतीक का मर्म यही है कि बाह्य वैभव कितना ही विराट क्यों न हो, यदि अंतःकरण विकारग्रस्त है तो विनाश अवश्यंभावी हो जाता है।
भगवान श्रीराम का चरित्र इसके विपरीत शक्ति और शील, पराक्रम और करुणा तथा अधिकार और कर्तव्य के संतुलन का आदर्श प्रस्तुत करता है। पिता की आज्ञा के पालन में राजसुख का त्याग, वनवास में धैर्य, विपत्ति में संकल्प और विजय के उपरांत मर्यादा—ये सभी प्रसंग रामत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। श्रीराम का जीवन बताता है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति अथवा कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण आचरण, सत्यनिष्ठा, वचनबद्धता और लोककल्याण की समग्र जीवन-पद्धति है। इसीलिए रामराज्य की अवधारणा भारतीय मानस में आदर्श शासन, सामाजिक समरसता और न्यायपरायण व्यवस्था की प्रेरणा बनकर जीवित है।
विजयादशमी का आध्यात्मिक स्वरूप मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी आलोकित होता है। नवरात्र की साधना और दशमी का विजयोल्लास शक्ति के जागरण, अधर्म के प्रतिरोध तथा धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश देता है। देवी दुर्गा का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप यह उद्घोष करता है कि जब दुष्प्रवृत्तियां मर्यादा का अतिक्रमण करती हैं, तब धर्मरक्षा के लिए शक्ति का जागरण अनिवार्य हो जाता है। भारतीय संस्कृति में शक्ति और शिव, ऊर्जा और चेतना तथा सामर्थ्य और सद्बुद्धि को परस्पर पूरक माना गया है। शक्ति की सार्थकता विनाश में नहीं, बल्कि अन्याय के उन्मूलन, निर्बल की रक्षा और लोकमंगल की स्थापना में है। राम-विजय और दुर्गा-विजय की दोनों परंपराएं इसी सनातन सत्य को प्रतिष्ठित करती हैं कि अधर्म की सत्ता चाहे जितनी प्रबल हो, धर्मनिष्ठ संकल्प के सम्मुख उसका स्थायित्व नहीं होता।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विजयादशमी भारतीय सभ्यता की बहुरंगी एकात्मता का अनुपम उदाहरण है। उत्तर भारत में रामलीला और रावण-दहन, पूर्वी भारत में दुर्गोत्सव की विजय परंपरा, दक्षिण भारत में मैसूर दशहरा तथा विभिन्न क्षेत्रों में शस्त्रपूजन और आयुधपूजन इस पर्व के विविध आयाम हैं। महाभारत के विराट पर्व में पांडवों के शमी वृक्ष पर छिपाए गए अस्त्रों को पुनः धारण करने का प्रसंग भी विजयादशमी की कुछ क्षेत्रीय परंपराओं से संबद्ध माना जाता है। रामलीला की पारंपरिक प्रस्तुति को वर्ष 2008 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में स्थान मिला। यह तथ्य रामकथा की वैश्विक सांस्कृतिक पहुंच और भारतीय लोकपरंपरा की जीवंतता को रेखांकित करता है। इन विविध रूपों के केंद्र में एक ही चेतना विद्यमान है—धर्म की प्रतिष्ठा, शक्ति का सदुपयोग और जीवन में शुभ संकल्पों का आरंभ।
वर्तमान समय में विजयादशमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठा है। भ्रष्टाचार, सामाजिक विद्वेष, हिंसा, पर्यावरणीय संकट, नैतिक मूल्यों का क्षरण और स्वार्थपरक प्रतिस्पर्धा आधुनिक समाज के सम्मुख गंभीर चुनौतियां हैं। ऐसे में रावण के पुतले का दहन तभी सार्थक होगा, जब हम अपने भीतर के अहंकार, छल, लोभ, क्रोध और संवेदनहीनता को भी समाप्त करने का संकल्प लें। पंचमहाभूतों के प्रति सम्मान का अर्थ पृथ्वी, जल, वायु और समस्त प्रकृति के संरक्षण का दायित्व स्वीकार करना भी है। जिस प्रकृति से हमारा अस्तित्व पोषित होता है, उसके संतुलन को नष्ट करना वस्तुतः अपने ही जीवनाधार को दुर्बल करना है। अतः आत्मसंयम, पर्यावरण-संरक्षण, सामाजिक सद्भाव और नैतिक उत्तरदायित्व को विजयादशमी के आचरणगत संकल्पों में सम्मिलित करना समय की आवश्यकता है।
वस्तुतः विजयादशमी का सनातन संदेश यही है कि पंचमहाभूतों से निर्मित शरीर में देवत्व का प्रकाश तभी प्रकट होता है, जब मनुष्य अपनी वृत्तियों को विवेक के अधीन कर लेता है। श्रीराम का आदर्श हमें मर्यादा सिखाता है, मां दुर्गा का स्वरूप निर्भीकता और शक्ति का सदुपयोग तथा रावण का पतन अहंकार के अनिवार्य परिणामों का बोध कराता है। आइए, इस विजयपर्व पर हम केवल बाह्य उत्सव तक सीमित न रहें, बल्कि अपने अंतःकरण में सत्य का दीप प्रज्वलित करें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और न्याय, करुणा तथा सदाचार को जीवन का आधार बनाएं। जब मनुष्य अपने भीतर के रावण को पराजित कर पंचमहाभूतों के साथ संतुलित सहअस्तित्व स्थापित करेगा, तभी विजयादशमी का वास्तविक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय प्रयोजन पूर्ण होगा। यही आत्मविजय है, यही धर्मविजय और यही विजयादशमी का शाश्वत संदेश।
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